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शब्दार्थ * {भरी हुई ए० ऐसे ही च० चार पं० पांच जो० योजन स० सो ब० बहुत स०आकीर्ण म० मनुष्य लोक म० { मनुष्य से क० कैसे ए० यह भ० भगवन् गो० गौतम ज० जो ते ० वे अ० अन्यतीर्थिक जा० यावत् म० { मनुष्य से ने० जो ते० वे ए० ऐसा आ० कहते हैं मि० मिथ्या अ० मैं पु० पुनः गो० गौतम ए० ( ऐसा आ० कहता हूं जा० यावत् ए० ऐसे ही च० चार पं० पांच जो० योजन स० सो ब० बहुत स० चत्तारि पंच जोयण सयाई, बहु समाइण्णे मणुयलोए मणुस्संहिं ॥ से कह मेयं
भावार्थ
409 अनुवादक बालब्रह्मचारी मुनि श्री अमोलक ऋषिजी -
भंते ! एवं ? गोयमा ! जण्णं ते अण्णउत्थिया जाव मणुस्सेहिं जे ते एव माहंसु मिअच्छा । अहंपुण गोयमा ! एंव माइक्खामि जाव एवामेव चत्तारिपंच जोयण सयाई (योजनका मनुष्यलोक मनुष्यों से भरदेते हैं तो यह किसतरह है ? अहो गौतम ! जो अन्यतीर्थिक ऐसा कहते हैं यावत् प्ररूपते हैं वे मिथ्या वैसा कहते हैं यावत् प्ररूपते हैं. मैं ऐसा कहता हूं यावत् प्ररूपता हूं कि जैसे काम पीडित युवान युवती को पकड़ता है. अथवा चक्र की नाभी में जैसे आरा सघन होता है वैसे ही { नरक में किसी स्थान चार सो किसी स्थान पांच सो योजन तक नारकी भरे हुवे रहते हैं. अहो भगवन् ! (नारकी वैक्रेय करते हुवे क्या एक रूप वैक्रेय करते हैं या अनेक रूप वैक्रेय करते हैं ? अहो गौतम ! { एक रूप भी वैक्रेय करते हैं अनेक रूप भी वैक्रेय करते हैं. एक रूप अनेक रूप वैक्रेय का शस्त्र जो पुद्गल है उस रूप का भी वैक्रेय करते हैं. संख्यात रूप बैक्रेय करते हैं परंतु
करते हुए मारने असंख्यात रूप
* प्रकाशक- राजाबहादुर लाला सुखदेवसहायजी ज्वालाप्रसादजी *
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