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शब्दार्थ |
आकर्णि ने० नरक ने० नारकी मं० भगवन् किं०क्या ए० एक प० समर्थ वि०वैक्रेय करने को पु० अनेक ) ॐ० ज० जैसे जी० जीवाभिगम में आ० आलापक त० तैसे णे० जानना. जा० यात्रत् दु० खरावरीति से सहन करे ॥ ११ ॥ आ० आधाकर्म अ० अनवद्य म० मन प० स्थापने वाला भ० होवे से० उसको त० उस ठा० स्थान की आ० आलोचना प० प्रतिक्रमण करते का काल क० करें अ० है त० उसको आ० आराधना ए० इस ग० गम से ने० जानना की० मोललिया हुवा क० बनाया हुवा उ० स्थपाया हुवा २० बहुसमाइणे नेरयलो नेरइएहिं ॥ नेरइयाणं भंते ! किं एगत्तं पभू विउव्विन्तए, पुहत्तं भू विउव्वित्तए, जहा जीवाभिगमे आलावगो तहा नेयव्त्रो, जाव दुरहियासे ॥ ११ ॥ आहाकम्मं अणवजेत्ति मणंपहारेत्ता भवइ; सेणं तस्स ठाणस्स अणालोइय अपडिक्कते कालं करे, नत्थि तस्स आराहणा; सेणं तस्स ठाणस्स आलोइय पडि{ वैक्रेय नहीं करते हैं. ऐसे ही बहुत शरीर वैक्रेय करते हैं, महा उज्वल प्रज्वल वेदना वेदते हुए विचरते हैं. { इस का विस्तार पूर्वक विवेचन जीवाभिगम सूत्र से जानना ॥ ११ ॥ कोई साधु भिक्षा की आलस्यवाला व रसमृद्धि बनकर आधाकर्मादि दोष युक्त आहार को निरवद्य मान कर भोगवे और उस की आलोचना प्रतिक्रमण किये विना यदि वह काल कर जावे तो वह आराधक नहीं होता है और { आलोचनादि करके काल करे तो आराधक होता है. ऐसे ही मोल लिया हुवा, बनाया हुवा, स्थापकर
गवेषणा में
सूत्र
भावार्थ
पंचमांग विवाह पण्णत्ति ( भगवती ) मूत्र
40 40 पांचवा शतक का छठ्ठा उद्देशा
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