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शब्दार्थ
48 अनुवादक-बालब्रह्मचारी मुनि श्री अमोलक ऋषिजी
पांच से स० शर प० पत्र फ. फल ण्टा तांत अ० सब से वह उ० बाण अ. अपनी गु० गुरुतासे, भा० वजनपने गु० गुरुतासे बजनपने अ० नीचे वी• स्वभाव से ५० पीछा आता जा. जो त० वहां पा० माणी जा० यावत् जी० जीव से क० पृथक करे ता० उतने में से० उस पु० पुरुष को क० कितनी कि० क्रिया गो• गौतम जा० जितने में से० वह उ० बाण अ० अपनी गु. गुरुतासे जा. यावत् २० पृथक करता है ता० उतने में से० उस पु० पुरुष को का० कायिकी जा० यावत् च० चार कि० क्रिया से पु. स्पर्शाया जे० जिन जी० जीवों के स० शरीरं धु०. धनुष्य नि० बना ते वे जी० जीव चा० चार कि०
भारियत्ताए अहे वीससाए पच्चोवयमाणे जाइं तत्थपाणाइं जाव जीवियाओ ववरोवेइ, तावं च णं से पुरिसे कइ किरिए ? गोयमा ! जावंचणं से उसू अप्पणो गुरुयत्ताए जाव ववरोवेइ तावंचणं से पुरिसे काइयाए जाव चउहि किरियाहिं पुढे, जर्सि पिणं जीवाणं सरीरेहिं धणू निव्वत्तिए ते जीवा चउहि किरियाहिं, धणुपिटे चउहि, लगा हुवा लोहे का भाला बना हुवा है उन सब को पांच क्रियाओं लगती हैं. अब अपने गुरुत्वपना से, वजनपना से, गुरुत्व व वजन पनासे स्वाभाविक वह बाप नीचे आता है. इस तरह नीचे आते हुए प्राण, भूतादि याद हणावे तो उस बाण छोडेनेवाले पुरुष को अहो भगवन् ! कितनी क्रिया लगे ? अहो गौतम ! उस पुरुष को चार क्रिया लगे. और निन जीवों के शरीर से वह धनुष्य, धनुष्य पाटिका ।
* प्रकाशक-राजाबहादुर लाला मुखदेवसहायजी ज्वालाप्रसादजी *
भावाथा