________________
शब्दार्थ + गौतम पा० प्राणियों का अ० अतिपात करके मु० मृषा व० बोल करके त० तथारूप स० श्रमण मा० { माहण को अ० अफ्रामुक अ० अनेषणिक अ० अन्न पा० पानी खा० खादिम सा० स्वादिम से प० देकर ए० ऐसे जी० जीव अ० अल्प आ० आयुष्यपने का क० कर्म प० करते हैं ॥ १ ॥ क० केसे मं० { भगवन् जी०जीव दी० दीर्घ आ० आयुष्यपने का क०कर्म प० करते हैं गो० गौतम नो नहीं पा० प्राणियों का अ० { अतिपात करने से नो० नहीं मु०मृषा व बोलने से त० तथारूप स० श्रमण मा० ब्राह्मण को फा० फ्राक ए० एषणिक अ० अन्न पा० पानी खा० खादिम सा स्वादिम प० देने से ए० ऐसे ख० निश्चय जी० जीव संवत्ता, तहारूवं समणंवा माहणंवा अफासुएणं अणेसणिज्जेणं असण पाण खाइम साइमेणं पडिला भेत्ता एवं खलु जीवा अप्पाउयत्ताए कम्मं पकरंति ॥ १ ॥ कहणं भंते ! जीवा दीहाउयत्ताए कम्मं पकरंति ? गोयमा ! नो पाणे अइवाइत्ता, नो मुसं वइत्ता, तहारूवं समणंवा माहणंवा फासुएसणिजेणं असणपाणखाइमसाइमेणं { होती है सो बताते हैं. अहो भगवन् ! किस तरह से जीव अल्पायुष्य का कर्म करते हैं ? अहो गौतम ! प्राणियों का वध करने से, मृषा बोलने से, व तथारूप श्रमण माहण को अफ्रासुक अनेषणिक आहार, (पानी, खादिम व स्वादिम देने से जीव अल्प आयुष्य बांधते हैं ॥ १ ॥ अहो भगवन् ! जीव कैसे दीर्घ आयुष्य बांधते हैं ? अहो गौतम ! प्राणियों का वध नहीं करने मृषा नहीं बोलने से व तथाभूत
सूत्र
भावार्थ
409 अनुवादक - बालब्रह्मचारी मुनि श्री अमोलक ऋार्षजी
* प्रकाशक- राजाबहादुर लाला सुखदेवसहायजी ज्वालाप्रसादजी *
६७४