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शब्दार्थ
१०१ अनुवादक-बालब्रह्मचारी मनि श्री अमोलक ऋषिजी 89
जा. यावत् प० प्ररूपता. हूं जे० जो पा० प्राणी भू० भूत जी० जीव स. सत्व ज. जैसे क० किया हुवा क० कर्म त० तैसी वे०वेदना वे० वेदते हैं तेने पा०प्राण ए०एवंभूत वेम्वेदना वेव्वेदते हैं शेष सब पूर्ववत् ॥२॥ पूर्ववत् ॥ ३ ॥ ज० जम्बूद्वीप में भा० भरत क्षेत्र में इ० इस उ• अवसर्पिणी के स० अवसर में
एवंभूयंवि चेयणं वेदंति, अणेवंभूयंवि वेयणं वेदंति ॥ से केणटेणं तंचेव ? गोयमा! जेणं नेरइयाणं जहा कडा कम्मा तहा वेयणं वेदेति तेणं नेरइया एवंभूयं वेयणं वेदेति जेणं नेरइया जहा कडा कम्मा णो तहा वेयणं वेदेति तेणं नेरइया अणेवं
भूयं वेयणं वेदेति । से तेणटेणं जाव वेमाणिया, संसारमंडलं नेयव्वं ॥ ३ ॥ यह किस तरह ? अहो गौतम ! प्राण भूतादि जिसरीति से कर्मों किये वैसी वेदना वेदते हैं वे प्राण भूतादि एवंभूत वेदना वेदते हैं और जो प्राण भूत जिसरीति से कर्मों किये वैसी वेदना नहीं वेदते हैं। वे अनेवंभूत घेदना वेदते हैं ॥ १ ॥ अहो भगवन् ! क्या नारकी एवंभूत वेदना वेदते हैं ? अहो गौतम ! नारकी एवंभूत अनेवेभूत ऐमी दोनोंप्रकार की वेदना वेदते हैं. अहा भगवन् ! यह किस तरह ? अहो नौतम ! जो नारकी जैसे कर्म किये बैसी वेदना बेदते हैं वे एवंभूत वेदता वेदते हैं और जो नारकी जैसे कर्म किये वैसी वेदना नहीं वेदते हैं वे अनेभूत वेदना वेदते हैं. इस तरह वैमानिक तक जानना. यह संसारचक्र में परिभ्रमण करनेवाले जीवों की वक्तव्यता कही. ॥ ३ ॥ अहो भगवन् ! जम्बूदीप के भरत क्षेत्र
* प्रकाशक-राजाबहादुर लाला सुखदेवसहायजी ज्वालाप्रसादजी *
भावा