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शब्दार्थ
49 अनुवादक-बालब्रह्मचारी मुनि श्री अमोलक ऋषिनी ।
दे० देव जा. यावत् क० करने को गो० गौतम ज• जो अ० अनुत्तरोपपातिक दे देव तक वहां रहे हुवे अ० अर्थ हे • हेतु प० प्रश्न का कारन वा० व्याकरण पु० पुछते हैं त• उसे इ० यहां रहे हुए के० केवली अ० अर्थ जा. यावत् वा० कहते हैं ते. इसलिये ज० यदि भं० भगवन् गो० गौतम ते. उन दे० देवों को अ० अनंत म० मनोद्रव्य व० वर्गणा ल० लब्ध प० प्राप्त अ० सन्मुखहुई ते. इसलिये के०
चेव समाणा अटुंवा, हेउवा, पसिणंवा कारणंवा, वागरणंवा पुच्छंति, तणं इहगए __ केवली अटुंवा जाव वागरणंवा. वागरेइ से तेणटेणं । जइणं भंते ! इहगए केवली
अटुंवा जाव वागरेइ तण्णं अणुत्तरोववाइया देवा तत्थगया चेव समाणा जाणंति पासंति ? हंता गोयमा ! जाणंति, पासंति । से केणद्वेणं जाव पासंति ? गोयमा ! '
तसिणं देवाणं अणंताओ मणीदव्व वग्गणाओ लढाओ पत्ताओ अमिसमण्णागयाओ। गौतम ! * अनुत्तरकल्पवासी देव. वहां रहे हुवे जो अर्थ, हेतु, प्रश्न, कारन, व्याकरण वगैरह पूछते हैं." उन का उत्तर केवली यहां रहे हुवे देते हैं इसलिये वे देवता समर्थ हैं. अहो भगवन् ! यहां रहे हुवे केवली जो अर्थ, हेतु वगैरह कहते हैं उन को अनुत्तर कल्पवासी देव क्या वहां रहे हुवे जान व देख सकते हैं ? हां गौतम ! वे जान व देख सकते हैं. अहो भगवन् ! किस कारन से वे जान व देख सकते हैं ?
* बारहवा अच्युत देवलोक से उपरके देवलोक के देवताओं का मनुष्य लोक में आगमन नहीं ह्येता है. .
* प्रकाशक-राजाबहादुर काला मुखदेवसहायजी जालाप्रसादजी *
भावार्थ