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________________ 434.38 ( भगवती ) सूत्र शब्दार्थ श्रमण भ० भगवंत म०:महावीर से ए० ऐसा बु· कहाये हुवे स० श्रमण भ० भगवंत म. महावीर को १०० वंदना करते हैं अ० अतिमुक्त कु० कुमार श्रमण को अ० ग्लानिरहित सं० अंगीकार करते हैं जा. यावत् वे० वैयावृत्य क० करते हैं ॥ ११ ॥ ते. उस का०काल ते. उस स० समय में म० महाशक्र क. देवलोक से म० महास्वर्ग वि० विमान से दो० दो दे. देव म० महदिक जा. यावत् म०y सारीरिए चेव, ॥ तएणं ते थेरा भगवंतो समणेणं भगवया महावीरेणं एवं वुत्तासमाणा समणं भगवं महावीरं वंदति नमसंति अइमुत्तं कुमारसमणं अगिलाए संगिण्हंति जाव वेयावडियं करंति ॥ ११ ॥ तेणं कालेणं तेणं समएणं महासुक्काओ कप्पाओ महासग्गाओ विमाणाओ दो देवा महिड्डिया जाव महाणुभागा समणस्स भगवओ भावार्थ अंत करेंगे. इसलिये अहो आर्यों ! तुम उन की हीलना, निंदा, खिंसना, गर्दा व तिरस्कार मत करो परंतु अग्लानपने उन को अंगीकार करो, उपष्टंभ करो और भक्त, पान व विनय से उन की वैयावृत्य करो. क्योंके अतिमुक्त कुमारश्रमण अंत करनेवाले चरिम शरीरी हैं. जब श्री श्रमण भगवंत महावीर og स्वामीने ऐसा कहा तब वे स्थविर भगवंत श्रमण भगवंत को वंदना नमस्कार कर आतिमुक्त कुमार श्रमण ?x 56 को अमलानपने अंगीकार करनेलगे यावत् भक्त पान व विनय से उन की वैय्यावृत्य करनेलगे ॥ ११ ॥ उस माल उस समयमें महाशुक्र देवलोकमेंसे महर्दिक यावत् महानुभागवाले दो देव श्रीश्रमण भगवंत महावीर विवाह पण्णत्ति पांचवा शतक का चौथा उद्देशा 8-488+
SR No.600259
Book TitleAgam 05 Ang 05 Bhagvati Vyakhya Prajnapti Sutra Sthanakvasi
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAmolakrushi Maharaj
PublisherRaja Bahaddurlal Sukhdevsahayji Jwalaprasadji Johari
Publication Year
Total Pages3132
LanguageSanskrit
ClassificationManuscript & agam_bhagwati
File Size50 MB
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