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2008
शब्दार्थ चि० हैं. ए. ऐसे ही ए०: एक ही जी० जीव का ब० बहुत आ० आजाति स० सहस्र ब. बहुत है।
yo आ० आयुष्य स० सहस्र आ० अनुक्रम से गं० ग्रथित चि० है शेष पूर्ववत् ॥ १ ॥ जी. जीव भं0001
भगवन् भ० योग्य ने नारकी में उ० उपजने को से वह किं० क्या सा० आयुष्य सहित सं० जाना है. नि० आयष्य रहित सं० जाता है. गो. गौतम सा० आयुष्य सहित सं० जाता है भो नहीं नि० आयुष्य रहित सं॰ जाता है. से उसने भ०भगवन् आ आयुष्य क कहा क०किया स० संचित किया गो० गौतम पु० पहिले भ० भव में क) किया पु. पहिले भव में सं० संचित किया ए. ऐसे जा __ खलु एगे जावे एगणं समएणं एग आउयं पडिसंवेदेइ, तं जहा इहभवियाउयवा,
पर भवियाउयंवा ॥ १॥ जीवेणं भंते ! जे भावए नेरइएसु उववजित्तए सेणं भंते किं साउए संकमइ निराउए संकमइ ? गोयमा सा उए संकमइ नो निरा
उए संकमइ ॥ सेणं भंते ! आउए कहिं कडे कहिं समाइण्णे ? गोयमा ! पुरिमे भावार्थ समय में इस भव के आयुष्य की वेदना नहीं होती है. इसलिये जीव एक समयमें इस भव का अथवा परभव ४४
का ऐसा एक ही आयुष्य वेदता है ॥ १ ॥ अहो भगवन् ! जो जीव यहां से नरक में जाता है वह
यहांपर नरक के आयुष्य का बंध करके जाता है या विना बंध किये हुए जाता है ? अहो गौतम ! 15 नारकी में उत्पन्न होनेवाला नेरया यहांपर नरक का आयुष्य बांधकर जाता है विना वांधे नहीं जा
पंचमान विवाह पण्णात्त ( भगवती.) सत्र
पांचवा शतकका तीसरा उद्देशा gogias