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शब्दार्थ
मुनि श्री अमोलक ऋषिजी 48 अनुवादक-बालब्रह्मचारी
भगवर ई० अल्प जा० यावत् वा वायु वा वाता है गो० गौतम ज. जब वा० वायु अ०: यथेच्छ रि० जाता है न तब ई० अल्प जा. यावत् वा० चलता है. ॥ ५ ॥ वा० कायु काय उ० उत्तर क्रेय वा वायु कुमार वा० वायु कुमारी अ० स्वतः के प० अन्य के उ० दोनों के अ० लिये वा• वायु काया की उ० उदीरणा करे त० तब ई० अल्प पु स्नेहवाला वायु ॥ ६॥ वा. वायु काय वा० वायु
रियंति तयाणं ईसिं जाव वायंति ॥ अत्थिणं भंते ईसिं ? हंता अस्थि! कयाणं भंते! ईसिं जाव वायंति ? गोयमा ! जयाणं वाउयाए उत्तरकिरियं रियइ, तयाणं ईसिं । ॥ ५ ॥ अत्थिणं भंते ! ईसिं ? हंता अत्थि । कयाणं भंते ! ईसिं पुरेवाया पुच्छा? गोयमा ! जयाणं वाउकुमारा, वाउकुमारीओ वा, अप्पणो परस्स वा तदुभयस्स म
वा अट्ठाए नाउकायं उदीरति, तयाणं ईसिं पुरेवाया ॥ ६ ॥ वाउयाएणं. १ स्नेहमयादि वायु चलते हैं ? हां गौतम ! स्नेहमयादि वायु चलते हैं. अहो भगवन् ! वे वायु कब है चलते हैं ? अहो गौतम ! वायुकाय का शरीर उदारिक है, उत्तरवैक्रय करके शरीराश्रितक्रिया से उनका जब गमन होवे तब के चले ॥ ५ ॥ अहो भगवन् ! क्या स्नेहमयादि चार प्रकार के वायु हैं ? हां गौतम ! अहो भगवन् ! वे स्नेहमयादि वायु कब चलते हैं ? अहो गौतम ! जब वायुकुमार देव स्वतः के लिये, अन्य के लिये अथवा दोनों के लिये वायुकाय नीकालते हैं तब वायुकाय
प्रकाशक-राजाबहादुर लाला मुखदेव सहायजी ज्वालाप्रसादजी*
भावार्थ
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