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________________ शब्दार्थ १० भगवन् पु० पूर्व में ए. ऐसे ५० पश्चिम में दा. दक्षिण में उ० उत्तर में उ० ईशान में | दा० अग्नि दा० नैऋत्य उ० वायव्य ॥ २॥ ज० जब भ० भगवन् पु० पूर्व में ई० थोडा पु० सस्नेह वायु ५० पथ्य वायु मे० पदमा का महायात्रु बा चला है त० तब ५० पश्चिम में हं० हां गो० गौतम ऐ०१ 20 पत्थावाया, मंदावाया, महावाया वायंति ? हंता अत्थि ॥ एवं पञ्चच्छिमेणं, दाहिणणं उत्तरेणं, उत्तरपुरच्छिमेणं, दाहिणपुरच्छिमेणं, दाहिपच्चच्छिमेणं, उत्तरपञ्चच्छिमेणं ॥२॥ जयाणं भंते ! पुरच्छिमेणं ईसिं पुरेवाया, पत्थावाया, मंदावाया, महावायावायंति;तयाणं पच्चच्छिमेणवि ईसिं पुरेवाया, जयाणं पञ्चच्छिमेणं ईसिं पुरेवाया, तयाणं पुरच्छिमे णवि ? हंता गोयमा ! जयाणं पुरच्छिमेणं तयाणं पञ्चच्छिमेणवि ईसि । जयाणं पच्चभावार्थ क्या चलते हैं ! हां गौतम ! उक्त प्रकार के वायु चलते हैं ॥ १ ॥ अहो भगवन् ! क्या पूर्व दिशा में अल्प स्नेहवाला वायु, पथ्यकारी वायु, मंद वायु व महा वायु चलते हैं ? हा गौतम ! पूर्व दिशा में उक्त । प्रकार के वायु चलते हैं. ऐसे ही पश्चिम, उत्तर. दक्षिण, ईशान, अग्नि, नैऋत्य व वायव्य कौन में भी ऐसे चार प्रकार के वायु चलते हैं ॥ २ ॥ अहो भगवन् ! जब पूर्व दिशि में स्नेहमय, पथ्य, मंद व महा वायु चलते हैं तब पश्चिम दिशा में क्या सहमयादि वायु चलते हैं ? हां गौतम ! जब पूर्व में उक्त प्रकार के वायु चलते हैं तब पश्चिम में भी वैसे वायु चलते हैं. और जब पश्चिम में वैसे वायु चलते । - पंचमाङ्ग विवाह पण्णत्ति ( भगवती) 432833 पांचवा शतक का दूसरा उद्देशा 80p
SR No.600259
Book TitleAgam 05 Ang 05 Bhagvati Vyakhya Prajnapti Sutra Sthanakvasi
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAmolakrushi Maharaj
PublisherRaja Bahaddurlal Sukhdevsahayji Jwalaprasadji Johari
Publication Year
Total Pages3132
LanguageSanskrit
ClassificationManuscript & agam_bhagwati
File Size50 MB
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