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शब्दार्थ तव उ० उत्तरार्ध में ५० प्रथम ओ० अवमर्पिणी ज० जब उ० उत्तरार्ध में ओ० अवसर्पिणी पं० है त०
तब ल० लवण समुद्र में पु० पूर्व प० पश्चिम में ने नहीं है ओ० अवसर्पिणी उ० उत्सर्पिणी स० श्रमण
आ० आयुष्मम् हैं. हां गो गौतम ना. यावत् स० श्रमण आ० आयुष्मन् ॥ १६॥ था० धातकी । रखंड में भ० भगवन् दी द्वीप में सू० सूर्य उ० ईशान कौन में उ. उदित होकर ज. जैसे जं. जम्बू
द्वीप की व० वक्तव्यता स. मय धा० धातकी खंडकी भा० कहना ण विशेष इ० इस आ० अभिलाप से स० सब आ० आलापक भा० कहना ॥ १७ ॥ ज० जब भ० भगवन् धा० धातकी खंड दी० द्वीप
लवण समुद्दे दाहिणद्वे पढमा ओसप्पिणी पडिवज्जइ, तयाणं उत्तरद्वे पढमा ओसप्पिणी पडिवज्जइ, जयाणं उत्तरढे पढमाओसप्पिणी पडिवज्जइ तयाणं लवण समुद्दे पुरच्छिम पञ्चच्छिमेणं नेवत्थि ओसप्पिणी उस्सप्पिणी समणाउसो ? हंता गोयमा ! जाव समणाउसो॥१६॥ धायइखंडेणं भंते ! दीवे सरिया उदीधिपाईण मुग्गच्छ जहेव जंबूद्दीवस्स छत्तव्वया, सव्वेव धायइखंडस्सवि भाणियव्वा, णवरं इमेणं अभिलावेणं सव्वे आलावगा
भाणियव्वा ॥१७॥जयाणं भंते ! धायइखंडेदीवे दाहिणद्वेदिवसे भवइ, तयाणं उत्तरद्वेवि भावार्थ
वसर्पिणी है तब पूर्व पश्चिम में अवसर्पिणी उत्सर्पिणी कुच्छ नहीं है, वगैरह अधिकार जानना. ॥ १६॥ अहो भगवन् ! धातकीखंड में सूर्य ईशान कौन में उदित होकर अग्नि कौन में क्या अस्त होता है ? ०७ हां मौतम ! इस का सब अधिकार जम्बूदीप जैसे कहना ॥ १७ ॥ जब धातकी खंड के दक्षिण विभाग
पंचमांग विवाह पण्णति (भमवती) मूत्र 80%80
पांचवा शतकका पहिला उद्देशा84880
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