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शब्दार्थ
भावार्थ
उ० उत्तरी भाग कहना ॥ १५ ॥ ल० लवण स० समुद्र में सू० सूर्य उ० ईशान कौन में उ० उदित है होकर ज० जैसी ज० जम्बूद्वीप की व वक्तव्यता भा० कही स० वैसी ही स० सब अ० विशेषता रहित (ल० लवण समुद्र की भा० कहना न० विशेष अ० अभिलाप इ० यह जा० जानना ज० जब ल० लवण समुद्र में दा० दक्षिण में दि० दिन भर होता है तं० वैसे ही जा० यावत् त० तव ल० लवण समुद्र की पु० पूर्व पश्चिम में रा० रात्रि मं० होती है ए० इस अ० अभिलाप से ने० जानना जा० यावत् ज० जब भ० भगवन् लः लवण समुद्र में दा० दक्षिण में प० प्रथम ओ० अवसर्पिणी प० होती है त० आलावओ भाणियव्वो । एवं उस्सप्पिणीएवि भाणियत्वो ॥ १५ ॥ लवणेणं भंते ! समुद्दे मूरिया उदीचिपाईण मुग्गच्छ जच्चैव जंबूद्दीवरस वत्तव्वया भाणिया, सच्चैव सव्वा अपरिसेसिया लवणसमुद्दस्सवि भाणियव्वा णवरं अभिलावो इमो जाणियव्वो जयाणं भंते ? लवणसमुद्दे दाहिणढे दिवसे भवइ तंचेव जाव तयाणं लवण समुद्दे पुरच्छिम पच्चच्छिमेणं राई भवइ || एएणं अभिलावेणं नेयव्वं जाव जयाणं भंते ? { जानना || १५ || अहो भगवन् ! लवण समुद्र में सूर्य ईशान कौन में उदित { अस्त होता है ? हां गौतम ! इस का सत्र वर्णन जम्बूद्रीप जैसे जानना
होकर अग्नि कौन में क्या यावत् लवण समुद्र में दक्षिण
भाग में दिन होता है तब पूर्व पश्चिम में रात्रि होती है मात् लवण समुद्र के दक्षिण भाग में प्रथम अ
१०१ अनुवादक - चालब्रह्मचारी मुनि श्री अमोलक ऋषिजी
* प्रकाशक - राजाबहादुर लाला सुखदेवसहायजी ज्वालामसादजी *
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