________________
शब्दार्थ
!
P
- पंचमांग विवाह पण्णत्ति ( भगवती ) सूत्र 488
द्वीप के दा० दक्षिण में प० प्रथम ओ० अक्सर्पिणी प० है त० सब उ० उत्तर में भी प० प्रथम ओ• अवसर्पिणी ५० होती है ज० जब उ० पुत्तर में प० प्रथम ओ० अवसर्पिणी जं० जम्बूद्वीप के म मेरु पर्वत की पु० पूर्व में प० पश्चिम में भी ने नहीं अ० है ओ० अवपिणा उ० उत्सर्पिणी अ० अवस्थित तक वहां का० काल प० प्ररूपा स० श्रमण आ० आयुष्मन् हं. हां गो० गौतम तं० वैसे ही उ० कहना २७| जा० यावत् स० श्रमण आ० आयुष्मन् ज० जैसे ओ• अवसर्पिणी आ० आलापक भा० कहना ए० ऐसे में
पढमा ओसप्पिणी पडिवज्जइ, तयाणं उत्तरद्वैवि पढमा ओसप्पिणी पडिवजइ; जयाणं भंते ! उत्तरढे पडिवजइ तयाणं जंबूद्दीवेदीवे मंदरस्स पव्वयस्स पुरच्छिमेणं पच्चच्छिमेणवि नेवत्थि ओसप्पिणी उस्सप्पिणी अवट्रिएणं तत्थकाले पण्णत्ते समणा
उसो ? हंता गोयमा ? तंचेच उच्चारेयव्वं जाव समणाउसो जहा ओसप्पिणीए दक्षिण विभाग में अवसर्पिणी होती है तब उत्तरविभाग में भी अवसर्पिणी होती है और जब उत्तर विभाग में अवसर्पिणी है लब क्या पूर्व पश्चिम विभाग में अवसर्पिणी उत्सर्पिणी नहीं है ? क्या वहां अवस्थित है। काल होता है ? हां गौतम ! जब उत्तर दक्षिण विभाग में अवसर्पिणी होती है तब पूर्व पश्चिम विभाग में अवसर्पिणी उत्सर्पिणी कुच्छ नहीं होती है परंतु वहां पर अवस्थित काल होता है. ऐसे उत्सर्पिणी का
पांचवा शतक का पहिला उद्देशा
भावार्थ