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शब्दार्थ पत्य जा० यावत् वि० विचरते हैं का काल म० महाकाल मु० सुरूा ५० प्रतिरूप पु० पूर्णभद्र अ०.
०७ देवपत्ति मा० माणिभद्र मी० भीम त० तैसे म० महाभीम किं० किन्नर किं० किपुरुष स. सत्पुरुष म02 महापुरुष अ. अतिकाय म० महाकाय गी० गीतरति गी० गीतयश ऐ० ऐसे वा० वाणव्यंतर ॥ १२ ॥
कालवाले, चित्त, पभ, तेओ, तहरुवचेव, जल, तहतुरियगतिया काल, आवत्त पढमाओ ॥ ११ ॥ पिसायकुमाराणं पुच्छा ? गोयमा ! दो देवा आहेवच्चं जाव विहरंति, तंजहा-कालेय, महाकाले , सुरूव, पडिरूव ; पुण्णभद्देय, अमरवइ, माणिभदे, भीमेय तहा महाभीमे ॥१॥ किंनर किंपुरिसे खलु, सप्पुरिसे खलु तहा महा
पुरिसे । अइकाय महाकाए-गीयरई चेवगीयजसे एए वाणमंतराणं ॥१२॥ जोइसियाणं देभावार्थ
१ सोम, २ कालबाल ३ चित्र ४ प्रभ, ५ तेउ, ६ रूप ७ जल ८ त्वरितगति ९ काल व १० आवर्त ॥११॥ अब व्यंतर जाति के देवता का प्रश्न पूछते हैं. अहो भगवन् ! पिशाच जाति के देव को कितने - देव अधिपति हैं ! अहा गौतम : दो देव अधिपति हैं काल व महाकाल. ऐसे ही भूत के दो देव रूप,
प्रतिरूप, यक्ष के दो देव पूर्णभद्र, मान भद्र, राक्षस के दो देव भीम, महाभीम, किन्नरजाति के दो देव " किन्नर, किंपुरुष, किं पुरुष के दो देव सत्पुरुष महापुरुष; महोरग के दो देव अतिकाय, महाकाय%3; * गंधर्व के दो देव १ गीतरति २ गीतयश यह आठ व्यंतर जाति के देव कह; और अन्यभी आठ व्यंतर
अनुवादक-बालब्रह्मचारामुनि श्री अमोलक ऋषिजी ?
*.प्रकाशक-राजावहादुर लाला सुखदेवमहायजी ज्वालाप्रसादजी*