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शब्दार्थ
9 अनुवादक-बालब्रह्मचारीमुनि श्री अमोलक ऋषिजी.
अ. अजान अ० अदृष्ट अ० नहीं सना अ० महीं स्मरा अ. नहीं जाना ॥ ६॥ ते० उन सो• मोम निकाय म० शक्र दे० देवेन्द्र के सो० सोम म. महाराजा को इ० यह अ० अपत्यदेव अ० जानेहुवे हो. थे १३० अंगारक वि० बैताल लो. लोहिताक्षस. शनैश्चर चं० चन्द्र स० सर्य मु० शुक्र बु० बुध व बृहस्पति
रा. राह स० शक दे० देवेन्द्र के सो० मोम म० महाराज की स० तीनभाग प० पल्यापम का ठि० स्थिति अ० अपसदेव की ए. एक प. पल्योपम की ठि० स्थिति म० महद्धिक जा० यावत् म०महानुभाग __ण्णाया ॥ ६ ॥ तेसिंवा सोमकाइयाणं सक्कस्स देविंदस्स देवरणो सोमस्स महारण्णो इमे अहावच्चादेवा अभिण्णाया होत्था तंजहा-इंगालए, वियालए, लोहियक्खे, सणिचरे, चंदे, सूरे, सुक्के, बुहे, बहसई, राह ॥ सक्करसणं देविंदस्स देवरण्णो
सोमरस महारण्णो सहभागं पलिओवमं ठिई पण्णत्ता ॥ अहावच्चाभिण्णायाणं देवाणं अर्थात् सोम महाराजा उक्त मव बातों को जानते हैं यावत् देखते हैं ॥ ६ ॥ उन शक्र देवेन्द्र के सोम महाराजा को पुत्रवतू आज्ञा पालनेवाले मंगल, केतु, लोहिताक्ष, शनैश्चर, चंद्र, सूर्य, शुक्र ब्रहस्पति, वराह नामक देव हैं. उन की स्थिति एक पल्योपम व एक पल्योपम के तीन भाग में का एक भाग अधिक का कही. और उन के अपत्य स्थान जो देव हैं उन की एक पल्योपम की स्थिति कही. + अहो गीतम !
* यद्यपि चंद्र की एक लक्ष वर्ष अधिक व मर्य की एक महत वर्ष अधिक की स्थिति कही है. परंतु यहां पर अधिकता की विवक्षा नहीं की गई है.
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* प्रकाशक-राजावहादुर लाला मुखदवसहायजी ज्वालाप्रसादजी *
भावार्थ