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भावार्थ
शब्दार्थों के अ० अमोध पा० पूर्वको वायु १० पश्चिम का वायु जा. यावत् सं० संवर्तक वायु गा० ग्राम में दा अनि ।
जा. यावत् सं० सनिवेश में दा. अग्नि पा० प्राणक्षय ज० जनक्षय ध० धनक्षय कु० कुलक्षय व० व्यसन भूत अ० अनार्य जे० जो अ अन्य त० तथा प्रकार स० शक्र दे देवेन्द्र का सो० सोम म०महाराजा का
जाव संवयवायाइवा, गामदाहाइवा, जाव सन्निवसदाहाइवा, पाणक्खया, जणक्खया, धणक्खया, कुलक्खया, वसणब्भूया. अणारिया जेयावण्णे तहप्पगारा ण ते सक्कस्स।
देविंदस्स देवरण्णो सोमस्स महारण्णो अण्णाया, अहिट्ठा, असुया, अमुया, अवि. श्वेत वर्ण से धूअर पडे, दिशा का रजस्वलपना होवे, चंद्र ग्रहण होवे, सूर्य ग्रहण होवे, चंद्र की चारों बाजुई थी में कुंडाला, मूर्य की चारों बाजु में कुंडाला, दो चंद्र देखने में आवे, दो मूर्य देखने में आवे, इन्द्र धनुष्य , होवे, इन्द्र धनुष्य के खंड होवे, बद्दल रहित आकाश में कपिहसन,समान विद्युत् होवे, सूर्य के उदय व अस्त समय में किरणों के विकार से रक्त कृष्णवर्ण वाले गाडे की धूरीके आकारवाला दंड होव, पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण की वायु संवर्तक होवे, ग्राम दाह यावत् सन्निवेश दाह वगैरह लक्षण होवे तब प्राणियों का, बल का, मनुष्य का, धन का, कुल का क्षय होवे, आपत्ति में पडे, अनार्य लोगों का आग-3
मन होवे वगैरह अनेक प्रकार के उपद्रव होवे. उक्त बातों शक्र देवेन्द्र के मोम महाराजा से अजान*पने से नहीं हैं, विना देखी, विना सुनी, स्मरण विना की, या अधि ज्ञान से नहीं देखी वैसी नहीं हैं.
494 पंचमांग विवाह पष्णत्ति ( भवगती) सूत्र
तीसरा शतक का सातवा उद्देशा 8
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