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शब्दार्थ |
सूत्र
भावार्थ
40- पंचमांग विवाह पण्पत्ति ( भगवती ) सूत्र 40
अ० अग्निकुमारी बा० वायुकुमार वा० वायुकुमारी चं० चंद्र सू० सूर्य ग० ॠ न० नक्षत्र ता० तारा जे० जो अ० अन्य त० तथा मकार स० सर्व ते ० वे उ० उन के सेवक त० उन के साहायक त० उन की भार्या जैसे स० शक्र दे० देवेन्द्र के सो० सोम म० महाराजा के आ० आज्ञा उ० उपपात ६० वचन (नि० निर्देश में चि० रहे ॥ ५ ॥ जं० जम्बूद्वीप में मं० मेरु की दा० दक्षिण में जा० जो इ० ये स० १२७ उत्पन्न होते हैं तं० वह ज० जैसे ग० ग्रहदंड ग० ग्रहमुशल ग० ग्रह, गर्जना ग० ग्रहयुद्ध न० ग्रह श्रृंगाअग्गिकुमारीओ, वायुकुमारा, वायुकुमारीओ चंदा, सूरा, गहा, नक्खत्ता, तारारूबा, यावणे तहष्पगारा सव्वे ते तब्भत्तिया तप्पक्खिया तब्भारिया ॥ सक्करस देविंदस्स देवरणो सोमरस महारण्णो आणा उववाय वयणनिसे चिट्ठति ॥ ५ ॥ जंबूदीवे वे मंदरस्त व्यस्त दाहिणेणं जाई इमाई समुप्पज्जंति तं गहदंडाइवा, महमुस
ऐसे अन्य भी देव रहते हैं. वे
वायुकुमार जाति के देव देवियों और चंद्र, सूर्य, ग्रह, नक्षत्र तारे व सोम महाराजा की भक्ति करते हैं, उन के पक्ष में रहते हैं, उन से बताया हुवा कार्य पूर्ण करते हैं. इस तरह वे उन की आज्ञा में प्रवर्तते हैं ॥ ५ ॥ जम्बूद्वीप के मेरु से दक्षिण में जब श्रेणी बन्ध मंगलादि तीन चार ग्रह का दंडाकार होवे, मूशल जैसे उपर नीचे
दंड की तरह तीच्छे श्रेणीबंध ग्रह होवे,
तीसरा शतक का सातवा उद्देशा
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