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शब्दार्थ
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अनुवादक-बालब्रह्मचारी मुनि श्री अमोलक ऋषिजी
गार भं० भगवन् भा० भवितात्मा वा बाह्य पो० पुद्गल अ. विना ग्रहणकिये प० ममर्थ ए० एक म०* वडा गा० ग्रामरूप न. नगर रूप जा. यावत् सः सन्निवेश वि०विकुर्वणा करने को गो० गौतम णो नहीं इ० यह अर्थ स. समर्थ ए. ऐसे वि० दसरा आ० आलापक न. विशेष बा. बाब पो. पुरलभ प० ग्रहण कर प० समर्थ ॥ ६॥ पूर्ववत् ॥ ७॥च० चमर भं० भगवनू अ० असुरेन्द्र को क• कितने
गारेणं भंते ! भावियप्पा बाहिरए पोग्गले अपरियाइत्ता पभू एगं महं गामरूवंवा, नगररूवंबा, जाव सण्णिवेसरूवंवा विकुवित्तए ? गोयमा ! णोइणट्टेसमटे, एवं विती
ओवि आलावओ । नवरं बाहिरए पोग्गले परियाइत्ता, पभू ॥६॥ अणगारेणं भंते ! . केइवयाई पभू गामरूवाइं, विकुवित्तए ? गोयमा ! से जहा नामए जुबई जुवाणे
हत्थेण हत्थे गेण्हेजा, तं चेव जाब विकुन्वितिवा ३, ॥ एवं जाव सण्णिवेसरूबंवा । भगवन् ! भावितात्मा अनगार बाहिर के वैक्रेय पुद्गल ग्रहण किये विना क्या ग्राम, नगर यावत् सनिवेश के रूप बनामकते हैं ? अहो गौतम ! वे बाहिर के पुद्गल ग्रहण किये विना ऐसे रूप नहीं बना सकते हैं. परंतु बाहिर के पुद्गल ग्रहण कर ऐसे रूप बना सकते हैं ॥ ६ ॥ अहो भगवन् ! वे भावितात्मा अनगार कितने वैक्रेय रूप बना सकते हैं ? अहो गौतम ! जैसे काम पीडित तरुण पुरुष तरुणी स्त्री को अपने हस्त से पकडता है ऐसे ही के अनगार एक लक्ष योजन का जम्बूद्वीप का ग्राम नगर यावत् सन्निवेश है।
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* प्रकाशक-राजाबहादुर लाला मुखदेवसहायजी ज्वालाप्रसादजी
भावार्थ
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