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शब्दार्थ गो० गौतम आः आत्म ऋद्धि नो नहीं प० दूसरे को ऋद्धि से पूर्ववत् ॥ ३ ॥५॥ x
- अ० अनगार भं० भगवन् मा• मायी मि० मिथ्या दृष्टि वीः वीर्य लब्धि से वि• विभंग ज्ञान लब्धि से का ० वाणारसी न० नगरी में स० विकुर्वणा कर रा० राजगृह न• नगर में रू० रूप ना० जाने पा०
पडागा, जण्णोवइएय होइ बोधव्वे । पल्हत्थिय पलियंके, अभियोगविकुव्वणा मायी तइयसए पंचमो उद्देसो सम्मत्तो ॥ ३ ॥ ५ ॥ * ॥
अणगारेणं भंते भावियप्पा मायी मिच्छदिट्ठी वीरियलहीए वेउव्यियलडीए विभंगउत्पन्न होते हैं. अहो भगवन् ! आपने कहा सो सत्य है. अब इस में उद्देशा का स्वरूप गाथा द्वाग संक्षेप से कहते हैं. स्त्रीरूप का, खड्ग म्यान का, पताका का, उपवित का, पल्हांठी का, पर्यंकासन का, और मायी आभियोगिक देव-सेवकपने उत्पन्न होते हैं वैसा कहा. यह तीसरा शतक का पांचवा उद्देशा संपूर्ण हा॥ ३ ॥५॥
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+ ___ अब इस छठे उद्देशे में भी वैक्रेय संबंधी प्रश्न करते हैं. अहो भगान् : मायी मिथ्यादृष्टि भावितात्मा अनगार वीर्य लब्धि व विभंग ज्ञान लब्धि से बाणारसी नगरी की विकुर्वणा करके क्या राजगृही नगरी
में मनुष्य पशु वगैरह के रूप माने देखे ! हां गौतम ! विभंग ज्ञान से जाने और अवधि दर्शन से देखे. 19 अहो भगवन् ! क्या वे यथातथ्य भाव जाने, देखे या अन्यथा भाव जाने देखे ? अहो गौतम ! यथा *
208 अनुवादक-बालब्रह्मचारी मुनि श्री अमोलक ऋपिजी g
*प्रकाशक राजावहादुर लाला सुखदेवसहायजी ज्वालाप्रसादजी *