________________
शब्दार्थभ होबे ५० पतला में मास सो. रुधिर भ० होवे जे० जो अ० यथा वा० पादर पो० पुद्गल ते. वे
प. परिण मे सोः श्रोतेन्द्रियपने जा० यावत् फा० स्पर्शेन्द्रियपने अ० अस्थि अ० अस्थिमिंज के०६ | केश मं० दाढी रो• रोम न० नखपने मु० शुक्रपने सो० रुधिरपने अ० अमायी लू० रूक्ष पा० पानी।
सिंदियत्ताए, अटुिअट्रिमिंजकेसमंसुरोमनहत्ताए सुक्कत्ताए सोणियत्ताए। अमाईणं लूहं पाण
भोयणं भोचा भोच्चाणोवामइ, तस्सणं तेणं लूहेणं पाण भोयणेणं अट्ठि अट्टिमिजा पयणु । भवंति, बहले मंस सोणिए जेवियसे अहाबादरा पोग्गला तेवियसे परिणमंति, तंजहा
उच्चारत्ताए,जाव सोणियत्ताए से तेण?णं जाव नो अमाई विकुव्वइ ॥माईणं तस्स ठाणस्स अहो गौतम ! जो मायावी साधु होते हैं वे स्निग्ध सरस आहार पानी का भोजन करते हैं. बलवृद्धि के
लिये वमन विरेचनादिक क्रियाओं करते हैं. ऐसे स्निग्ध पान भोजन से उन की हड्डीव हड्डीकी मिजी बढती । .: है मांस शोणित पतले होते हैं यथावादर पुद्गल श्रोतेन्द्रिय यावत् स्पर्शेन्द्रिय, अस्थी, अस्थि की
मिंजी, केश, श्मश्रु, रोम, नख, शुक्र व रुधिरपने परिणमते हैं और इस से वैक्रय रूप बना सकते हैं. जो अमायी होते हैं वे रूक्ष निरस आहार करते हैं और वमन विरेचनादि क्रियाओं नहीं करते हैं. उन कोई
रूक्ष आहार से हड्डी और हड्डी की मीजी पतली होती है. मांस व लोही सघन होता है. उन को पानी व * आहार रूप से ग्रहण किये हुवे पुल बडीनीत, लघुनीत, श्लेष्म, खेकार, वमन, पित्त, यावत् रुधिरपने
48-48 पंचमांग विवाह पण्णत्ति ( भवगती ) सूत्र *
48848 तीसरा शतक का चौथा
भावार्थ