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शब्द
है. हां १० समर्थ ॥ १ ॥ जी. जीव भ. भान् जे. जो ने. नरक में उ० उत्पन्न होवे से वह भं० भगवन् कि० किम ले लेश्या से उ० उत्पन्न होवे गो. गौतम जं. जिस ले. लेण्या
अनुवादक- लब्रह्मचारी मुनि श्री अमोलक ऋषीजी >
पुरिसे, आसे, हत्थी । पभणं भंते बलाहए एरां महं जाणरूवं परिणामेत्ता अणेगाई जोयणाई गमित्तए, जहा इत्थिरूवं तहा भाणियव्यं । नवरं एगओ चक्कवालंपि,
दुहओ चकवालंपि भाणियब्वं ॥ जुग्गगिल्लिथिल्लिसीयासंदमाणियाणंतहेव ॥ ९ ॥ __जीवेणं भंते जेभविए नेरइएसु उक्वजित्तए, सेणं भंते ! किं लेस्सेसु उववजइ ? गोजब मेघ सो आदि का रूप बना सकता है तब क्या उमे स्त्री वगरह कहना. अहो गौतम : उमे मेघही कहना परंतु स्त्री पुरुष वगैरह नहीं कहना. अहो भगवन ! वे वहल विमान का रूप बनाकर अनेक योजन तक क्या जा सकते हैं? हां गौतम : वे जा सकते हैं वगैरह जैमा स्त्री का अधिकार कहा वैसे ही है यहां कहना. विशेष उपर जो यान का रूप बनाकर विमान की गति का कथन किया मो एक चक्र में भी जामकत हैं, और दो चक्र से भी जासकते हैं. इमी प्रकार धनरा, अंबाडी, थिल्ली शिविका, व मंदमनी वगैरह का कथन जानना. ॥ ॥ गमन के शिकार मे गति गमनका प्रश्न करते हैं. अहो भगवन ' जो जीव नारकी में उत्पन्न होने वाला है वह कृष्ण लश्यादि लेश्या में से कौनमी लेण्या महित उत्पन्न
प्रकाशक-राजाबहादुर लाला मुखदर सहायजी ज्वालाप्रसादजी *
भावाथ