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शब्दार्थ
दिक-बाल ब्रह्मचारीमुनि श्री अमोलक ऋपिजी >
ए. ऐसे आ० आत्म कम से आ. आत्म प्रयोग से भा. कहना ॥ ७॥ स. वह किं. क्या उ.. ऊर्श्व पताका जैसे ग० जावे ५० नीचीपताका जैसे ग. जावे गो. गौतम ऊ० ऊर्ध्व पताका जैसे ग. जावे प. नाचीपताका जैसे ग. जावे से वह भं• भगवन् किं. क्या ए. एक दिशा में १० पताका जैसे ग. जावे दु. दोनों दिशामें प० पताका जैसे ग. जावे गो० गौतम ए? एकदिशा में प० पताका जैसे ग. जावे नो नहीं दु० दोनों दिशा में प० पताका जैसे ग. जावे मे० वह भं० भगवन् कि० क्या
आयकम्मणावि, आयप्पयोगेवि भाणियव्वं ॥ ७ ॥ से भंत! किं ऊसिओदयं गच्छइ, पतोदयं गच्छइ ? गोयमा ! ऊसिओदयंपि गच्छइ पयोदयंपि गच्छइ, ॥ से भंते ! किं एगओ पडागं गच्छइ, दहओ पडागं गच्छइ ? गोयमा ! एगओ पडागं गच्छइ.
नो दुहओ पडागं गच्छइ. ॥ से भंते ! किंवाउकाए पडागा ? गोयमा ! वाउकाएणं जासकती है. ॥ ७॥ अहो भगवन् ! क्या वह वायकाय ऊंची पताका के आकार से जाती है या नीची पताका के आकार से जाती है ? अहो गौतम ! ऊंची पताका के आकार से भी जाती है और नीची पताका के आकार में भी जाती है. अहो भगवन् ! क्या यह एक पताका या दो पताका से जाती है ? अहो गौतम : एक पताका का रूप बनाकर जाती है परंतु दो पनाका का रूप बनाकर नहीं जानी है. अहो भगवन् ! उसे क्या वायुकाय कहना या पताका कहना ? अहो गौतम :
* प्रकाशक-राजावहादुर लाला सुखदेवसहायजी घालापसादजी *
भावार्थ