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शब्दाथ लोकस्थिति ला लोकानमार ॥ ३ ॥३॥
___ अ. अनगार भं० भगवन भा० भावितान्मा दे देव को व वैक्रय म समुदयान में स. नीकालता जा० यानरूप से जा. जाते को जानाने पा- देखे गोः गौतम अकितनक दे दवको पा देखे नो. नहीं जा० यान को पा० देखे अकितनक गे नहीं दे देवको नो० नहीं जा. यान को पा० देखे
रिया सम्मत्ता ॥ नइयसयस तईओ उद्देसो सम्मत्ती ॥ ३ ॥ ३ ॥ * ॥ है अणगारेणं भंने भावियप्पा देवं वउविय समुग्घाएणं समोहय जाणवणं जाय
माणं जाणइ पासइ ? गोयमा ! अत्थगइए देवं पासइ नो जाणं पासइ, अत्थेगइएणं
जाणं पासइ नो देवं पासइ, अत्थेगइए देवपि जाणंपि पासइ, अत्थेजानना. अहो भगवन् ! आप जो कहते हैं वह सत्य है ऐसा कहकर गौतम स्वामी विचरने लगे. या CE क्रिया का अधिकार संपूर्ण हुवा यह तीसरे शतकका तीसरा उद्देशा पूर्ण हुवा ॥ ३ ॥३॥ * , ३ तीसरे उद्देशे में क्रिया का अधिकार कहा. वह ज्ञानवंत को प्रत्यक्ष होती है मो बताते हैं. श्री गौतम स्वामी प्रश्न करते हैं कि अहो भगवन् ! वैकेय समुद्घात से उसर वैकेय करके विमानादि रूप बना कर
जाते हुवे देव को भावितात्मा अनगार क्या ज्ञान से जानते हैं और दर्शन से देखते हैं ? यहां पर ७ अवधिज्ञान की विचित्रता से चौभंगी जानना. १ कितनेक देव को देखते हैं परंतु विमान को नहीं ॐ देखते हैं कितनेक विमान को देखते हैं परंतु देव को नहीं देखते हैं ३ कितनेक देव व विमान दोनों
पंचमांग विवाह पग्णत्ति ( भगवती) सूत्र
<3 <33- तीसरा शतकका चौथा उद्देशा 9821
भावार्थ
अहो भगवन् ! वैक्रेय समुद्घ जानते हैं और दर्शन से देखत विमान को नहीं
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