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शब्दाथ वह नाव उ० उम आ० आश्रय द्वार से आ. भरी हुई पु० पूर्ण वो उछलती वो० उल्लास पामती स..।
भरी हुइ चि० रहे हैं. हां चि० रहे के० कोई पुरुष ता• इस नाव को स० सब बाजु आ० आश्रय द्वार
पि० ढांक कर ना० नाव का उ० बरतन से उ० पानी उ० नीकाले सा० वह ना. नाव तं० उस उ०१ सत्र
विद्धंसमागच्छइ ? हंता विद्वसमागच्छइ ॥ से जहा नामए हरएसिया पुण्णे पुण्णप्पमाणे । वोलटमाणे वोसट्टमाणे समभरघडत्ताए चिट्ठइ, अहेणं केइपुरिसे तंसि हरयंसि एगंमहं णाथं सयायंसयच्छिदं उग्गहेजा ? सेनणं मंडियपुत्ता ! सा नावा तिहिं आसवदारेहि आपूरमाणी आपूरमाणी पुण्णा पुण्णप्पमाणा वोलट्टमाणा बोसवमाणा समभरघडत्ताए चिट्ठइ ? हंता चिट्ठइ ॥ अहेणं केइपुरिसे तीसे नाबाए सव्वओ समंता आसवदाराई पिहेइ २ त्ता नावा उस्सिचणएणं उदयं रस्सिचेन्जा ? सेणणं मंडियपुत्ता ! सा नावा तंसि
उदयंसि उस्सित्तंसि समाणंसि खिप्पामेव उ8 उदाइ ? हेता उदाइ, एवामेव मंडिय पुत्ता! भावार्थ वन् ! वह बिन्दु शीघ्र. नष्ट होता है. और जैते बहुत परिपूर्ण घट समान एक द्रह है. पानी ।
बाहिर नीकल रहा है ऐलावह भराहवा है. अब कोई पुरुप छितवाली नावा इस मे डाले तो छिद्र से नावा में
पानी आते २ क्या वह नावा पानी के तल में जाकर बैठती है ? हां वह नावा छिद्रों से पानी भर जाने 12 से तलेपर जाकर बैठती है. यदि कोई पुरुष उस के छिद्रों बंधकर के उस में रहा हुवा पानी नीकालकर
अनुवादक-बालब्रह्मचारी मुनि श्री अमोलक ऋपिजी
प्रकाशक-राजाबहादुर लाला मुखदवसहायजी ज्वालाप्रसादजी*