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शब्दार्थ
388- पंचमांग विवाह पण्णत्ति ( भगवती) मत्र 40880%
प्रकार की मं० मंडितपुत्र दु० दोप्रकार की अ० अनुपरत कायक्रिया दु० दुप्रयुक्त कायक्रिया ॥ १ ॥ अ० अधिकरणकी भं० भगवन कि० क्रिया क० कितने प्रकार की मं० मंडित पुत्र द० दोप्रकार की सं. संयोजन अधिकरण क्रिया नि० निवर्तन अधिकरण क्रिया ॥ ३ ॥ प्रवपिकी भ० भगवन् कि० क्रिया का कितने प्रकार की मं मंडितपुत्र दु० दोपकार की जी. जीव प्रपिकी अ० अजीव प्रदूषिकी
दविहा पण्णत्ता, तंजहा अणुवरयकाय किरियाय, दुप्पउत्तकाय किरियाय ॥ २ ॥ अहिगराणियाणं भंते ! किरिया कइविहा पण्णत्ता ? मंडियपुत्ता ! दुविहा पण्णत्ता, तंजहा संजोयणाहिगरण किरियाय, निव्वत्तणाहिगरण किरियाय ॥ ३ ॥ पाओसियाणं भंते ! किरिया कइविहा प• ? मंडियपुत्ता : दुविहा प• तंजहा जीय पाओ
सियाय अजीव पाओसियाय ॥ ४ ॥ पारियावणियाणं भंते ! किरिया कइ.. पाप से निवर्तना नहीं सो और दुप्रयुक्त सो दुष्ट प्रयोग के सद्भाव से ॥२॥ अहो भगवन् ! अ. धिकरणिकी क्रिया के कितने भेद कहे हैं! अहो मंडित पुत्र ! हल घर वगैरह में जो कोई यंत्रादि न होवे उस का संयोग मीलाने से जो क्रिया लगे सो संजोयणाधिकरण क्रिया और खङ्गादि नविन उत्पन्न करना सो निवर्तनाधिकरण क्रिया ॥ ३ ॥ अहो भगवन् ! प्रवेषिकी क्रिया के कितने भेद कहे हैं ? अहो मंडितपुत्र ! जीव पर मत्सर भावरखे सो जीव प्रद्वेषिकी और अजीव पर मत्सर भाव रखे सो अजीव
११0><2 तीसरा शतक का तीसरा उद्देशा
भावार्थ
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