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________________ 2:03. सन शब्दार्थश्व में इ. इसरूप अ. अध्यासाय जा. यावत सः उत्पन्न होवे पूर्ववत ॥३॥२॥ ते० उम काल ते. उस समय में रा० राजगृह नः नगर हो था जा. यावत् १० परिपदा पपीली गई। Vते. उस काल ते० उस सयम में जा. यावत् अं० अंतेवासी मं० मंडित पुत्र अ. अनगार प. प्रकृति ते जाणामो ताव सकारस देविंदरस देवरपणो दिव्वं देविढेि जाव अभिरसमण्णागयं जाणओ ताव अम्हेवि सके देविंदे देवराया दिव्वं देविढि अभिसमण्णागयं ॥ एवं खलु गोयमा ! असुरकमारा देवा उट्ठ उप्पयंति, जाव सोहम्मे कप्पे सेतं भंते त्ति, चमरो सम्मत्तो । तइयसए बीओ उहेसो सम्मत्त ॥ ३ ॥ २ ॥ तेणं कालेणं तेणं समएणं रायगिहे नाम नयरे होत्था, जाव परिसा पडिगया ॥ * ॥ तेणं कालेणं तेणं समएणं जाव अंतेवासी मंडिय पुत्ते णामं अणगारे, पगइभदए जान भावार्थ पास जाऊ, प्रगट होऊं, और उन की ऋद्धि देखू. पहिले शक देवेन्द्र को प्राप्त हुई ऋद्धि देखो. पहिले शक देवेन्द्र को दीव्य ऋद्धि प्राप्त हुई ऐसा मानते हैं. इस कारन से असुर कुमार देव ऊंचे सौधर्म , yel देवलोक में गये और जावेंगे. अहो भगवन् ! आप के वचन सत्य हैं. यह चमरेन्द्र का आधिकार संपूर्ण हुवा यह तीसरा शतकका दूसरा उद्देशा पूर्ण हुवा।॥ ३ ॥२॥ + + 11 उस काल उस समय में राजगह नामक नगर था. उस की ईशान कौन में मुणशील नामक उद्यान पंचमांग विवाह पण्णत्ति (भगवती) सत्र 2 तीसरा शतक का तीसरा उद्देशा 8.3><3280
SR No.600259
Book TitleAgam 05 Ang 05 Bhagvati Vyakhya Prajnapti Sutra Sthanakvasi
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAmolakrushi Maharaj
PublisherRaja Bahaddurlal Sukhdevsahayji Jwalaprasadji Johari
Publication Year
Total Pages3132
LanguageSanskrit
ClassificationManuscript & agam_bhagwati
File Size50 MB
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