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शाद
का उ० ऊर्ध्व उ० चडने का काल उ० उतरने का काल सं० संख्यात गुणा च० चमर का ज० जैसे ०७ स० शक्र का ण० विशेष स० सर्व से थोडा उ० उतरने का काल उ० उपर जाने का सं० संख्यात ७० गणा व० वज्र की पु० पृच्छा गो० गौतम स० सर्व से थोडा उ० उपर जाने का उ० नीचे आने का वि० विशेषाधिक ॥ ३८ ॥ ए इस व० वज्र का व वज्र के अधिपति का चश् चमर अ० असुरेंद्र का उ०
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सूत्र
भावार्थ
43 पंचमांग विवाह पण्णत्ति ( भगवती ) सूत्र 400
40 तीसरा शतकका दूसरा उद्देशा ८०३
गोयमा ! सव्वत्थोवे सक्कस्स देविंदस्स देवरण्णो उङ्कं उप्पयण काले, उवयणकाले संखेज्जगुणे ॥ चमरस्सवि जहा सक्करस णवरं सव्वत्थोवे उवयणकाले, उप्पयणकाले संजगुगे || वजस्त पुच्छा गोयमा ! सव्वत्थोवे उप्पयणकाले, उवयणकाले विसेसाहिए, ॥ ३८ ॥ एयस्सणं भंते ! वजस्स वज्जाहिवइस्स, चमरस्स्य, असुरिंदरस | अब काल की अल्पाबद्दुत्व करते हैं. अहो भगवन् ! शकेंद्र को नीचे उतरने स्वामी शक्र वज्र चमर के काल में, उंचे चडने के काल में कोनसा अल्प, बहुत, तुल्य या विशेषाधिक है ? अहो गोतम ! शकेंद्र को ऊंचे जाने में सब से थोडा काल लगता है, क्यों की शक की ऊर्ध्व गति शीघ्र है. इस से नीचे उतरने का काल ) संख्यात गुना. चमरेंद्र को सब से थोडा नीचे उतरने का काल और उस से उपर जाने का काल संख्यात गुना. वज्र को सब से थोडा काल ऊंचे जाने में लगता है उस से नीचे आने में विशेषाधिक काल लगता है ॥ ३८ ॥ अब
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ऊर्ध्व |२४ १२ तिच्छी १८ १० १६
अधो १२
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