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________________ शब्दार्थ -<ka2 अनुवादक-बालब्रह्मचारी मुनि श्री अमोलक ऋषिजी 89 से प्राप्त इ० यहां अ. आज उ० उपशम को प्रान होकर वि०विचरता हूं खा. क्षमाता हूं दे. देवानुप्रिय ख०क्षमाकरो में मुझे बक्षमाकग्ने अ• योग्य दे देवानुपिय नहीं भुवारंवार ए ऐसा क० करने को त्ति ऐसा करके म० मुझे वं. बंदना कर न० नमस्कार कर उ० ईशान कोन में अ. अतिक्रम वा० बांया पा० पांच से ति तीनवक्त भू भूमि को दा० विदार च. चमर अ. असुरेंद्र को एक ऐसा व. ___ इह समोसढे, इह संपत्ते, इहेव अज उवसंपजित्ताणं विहरामि ॥ तं खामेमिणं देवाणुप्पिया ? खमं तुम देवाणुप्पिया ? खंतुमरिहंतुणं देवाणुप्पिया ! नाइ भुजो २ एवं करणयाए तिकटु मनं बंदइ नमसइ, नभंसइत्ता उत्तर पुरच्छिमं दिसीभागं अवकाइ अवकामइत्ता, वामेणं पादेणं तिक्खुत्तो भूमिं दालेइ. चमर अ * प्रकाशक-राजाबहादुर लाला सुखदेवमहायजी ज्वालाप्रसादजी * भावार्थ और आप मे चार अंगुल प्रमाण वज दूर रहत ने पीछा रखींच लीया. वजू पीछा खींचने के लिये मैं यहाँ पर आया हुवा है. यहां समोसर्या, व प्राप्त हुवा है. यहां पर इस उधान में आज पाप को उपशमाता दवा पिचरता हूं. इस से अहो देवानुप्रिय ! मैं आप की क्षमा याचता है, आप मुझे क्षमा करें. आप त्रमा करने योग्य हो. अब मैं वारंवार ऐसा नहीं करूंगा ऐसा कहकर वंदना नमस्कार करके ईशान न 10 कोन में गया. और वायें पांच में भूमि को तीन वक्त विदार कर चमरेन्द्र को ऐसा कहने लगा कि
SR No.600259
Book TitleAgam 05 Ang 05 Bhagvati Vyakhya Prajnapti Sutra Sthanakvasi
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAmolakrushi Maharaj
PublisherRaja Bahaddurlal Sukhdevsahayji Jwalaprasadji Johari
Publication Year
Total Pages3132
LanguageSanskrit
ClassificationManuscript & agam_bhagwati
File Size50 MB
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