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________________ शब्दाय 80 सत्र पवमांग विवाह प्रणनि ( भवगनी ) सत्र न कु. कपिन होने का नामर म ममन्द्र काव: वर केलिये व वन नि नीकाला त• तब म: मुझेप इस गमाग जायावन म उत्पन्न हया कामहैं। ५० ममर्थ च चमर अ अमरेंद्र नने जा: याचन और अवधि ज्ञान को ५० प्रयंजता दे देशप्रिय को और अवधिज्ञान मे आदेखे जा यावन में जहां दे दचान भय ने तहां आया ददेवानुप्रिय को च. चार अंगुल अ. अप्रासका ग्रहण करता हूं व. बज को प० ग्रग काले कालय आ• आया इ. यहां अहं तुझ नीमाए चमरणं अमुग्दिणं असुररणो सयमेव अच्चामाइए, तएणं मए कुविएणं समागणं चमरस्व असुरिंदरस असुररणो वहाए बजे निर्मिद्र, तएणं ममं इमेयारूवे यन्थिए जाव समुप्पजेत्था, णो खलु पभ चमरे असुरिंदे असुरराया तहेव जाव ओहिं पउन्नामि, देवाणुाप्पिए ओहिणा आभोएमि, हाहा जाब जेणेव देवाणप्पिए तेणेव उवागच्छा मि देवाणुप्पियाणं च उग्गुलमसंपत्तं वज पडिसाहरामि. वजं पडिसाहरणट्ठयाएणं इह मागए, का शरण लेकरके चमरेन्द्र ने मेरी आमातना की इस से बहुत कोधिन होकार ने अनुरेन्द्र का वध के लिये बच फेंका. फीर मुझे ऐसा अध्यवसाय यावत् चिन्तवन हुवा कि चमर अमुरेन्द्र अर्य सौधर्म देवलोक में आने को समर्थ नहीं है, अरिहंत यावन् अनगार का शरण लिये विना नहीं आसकता है. इस से मैंने अवधि ज्ञान प्रयुंजा और अवधि ज्ञान से आप को देखे. फोर खेद करता हुवा आषकी ममीप आया नीसग शतक का दूसरा उद्देशा भावार्थ - Per
SR No.600259
Book TitleAgam 05 Ang 05 Bhagvati Vyakhya Prajnapti Sutra Sthanakvasi
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAmolakrushi Maharaj
PublisherRaja Bahaddurlal Sukhdevsahayji Jwalaprasadji Johari
Publication Year
Total Pages3132
LanguageSanskrit
ClassificationManuscript & agam_bhagwati
File Size50 MB
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