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व० बजू अ० सन्मुख आ. आता पा. देखकर झि० चिन्तवनकर पि० इच्छकर त० तैसे सं० भगा हुवा PO म. मुकुट वि० विस्तार सा० आलंबन सहित ह. हस्त आ० आभरण उ. उर्ध्व पांच अ० नीचाशिर
क० कक्षा ग० रहा हुवा से० स्वेद मु. मूकता ला• उस उ० उत्कृष्ट जा. यावत् ति० तिर्छा अ० असं-X ख्यात दी. द्वीप समुद्र म० मध्य से वी० अतिक्रमता जे. जहां जं. जंबुद्वीप जा. यावत् म. मेरी अं०
झियाइ, पिहाइ, झियाइत्ता पिहाइत्ता तहेव संभग्ग मउड विडए, सालं| बहत्याभरणे उद्वैपाए अहो सिरे कक्खागयसेयंपिव विणिं मुयमाणे मुयमाणे ताए उहै किटाए जाव तिरिय मसंखेजाणं दीवसमुदाणं मझं मझेणं वीईवयमाणे २ जेणेव जं
बूद्दीवे दीये जाव जेणेव असोगवर पायवे, जेणेव ममअंतिए तेणेव उवागच्छइ उवावाला वज़ को सामने आता हुवा देखकर यह चमरेन्द्र यह क्या होगा ऐसा चिन्तवन करने लगा, यह मुझे होवे ऐसी इच्छा करने लगा, अपने स्थान जाने को वांच्छने लगा, और वजू का आताप नहीं सहन होने से चक्षु बंध करता हुवा व्याकुल होने लगा. इस तरह चिन्तवन करके पीछा फीरा, सिर का मुकुट नीचे पडने लगा, आभरणों हस्त से पकडे, अधो गमन होने से ऊंचे पांव नीचा सिर हुवा और जैसे मनुष्य के शरीर में से स्वेद छटता है वैसे ही चमरेन्द्र के शरीर में से स्वेद रूप पुगल टपकनेलगा. फार देव की दीव्य गति से यावत् असंख्यात दीप समुद्र की मध्य में होकर जम्बूद्वीप के भरत क्षेत्र में सुंसुमार नगर के
पंचमांग विवाह पण्णत्ति ( भगवती) सूत्र 40889
भावार्थ
तीसरा शतक का दूसरा उद्देशा8080