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भावार्थ
4 अनुवादक-वालह्मचारीमुनि श्री अमोलक ऋषिजी
के० कोन ए० यह अ० अप्रार्थित की १० प्रार्थना करता है दु० दुष्ट अंत १० असनोड स०डरुण गांज्य हि० लज्जा सि० लक्ष्मी १० रहित ही ० हीन पु० पुन्य चतुर्दशी को जन्मा जे० जिससे म• मेरा इ० ग ए० ऐसे दि० दीव्य दे० देवऋद्धि जा० यावत् दे० देवानुभाव छ० लब्ध प० प्राप्त अ० सन्मुख हुवा ७० उपर अ० थोडा उ० उछरंग दि० दीव्य भो० भोग मुं० भोगते वि० विचरता है ए० ऐसा सं० विचार कर सा० सामानिक प० परिषदा में उ० उत्पन्न दे० देवोंको स० बोलाकर ए. ऐसा प० बोला के० कौन ए• यह दे० देवानुप्रिय अ० अप्रार्थित की प० प्रार्थना करता है जा यावत् भुं० भोगवना वि० ॥ २२ ॥ पासइन्ता इमेयारूवे अम्मत्थिए चिंतिए, पत्थिए, मणोगए संकप्पे समुप्प-' जित्था : केसणं एस अप्पत्थिय पत्थए दुरंतपंतलक्खणे हिरिसिरिपरिवज्जिए, हीणपुण्णचाउहले जेणं मम इमे एयारूवाएं दिव्वाए देवडीए जाब दिल्वे देवाणुभावे लढे, पत्ते, अभिसमण्णागए उपि अप्पुस्सुए दिव्वाई भोगभोगाई भुंजमाणे विहरइ प्रार्थना करनेवाला [ मरण की वांच्छा करनेवाला ] अपनोज लक्षणत्राला, लज्जा, लक्ष्मी रहित, हीन पुण्य चतुर्दशी में उत्पन्न होनेवाला ऐसा यह कोन है, मुझे जो ऐसी दीव्य देवर्द्धि यावत् दीव्य महानुभाग प्राप्त हुवा | है उनकी उपर यह अल्प उत्सुक बनकर दीव्य भोग भोगवता हुआ विचरता है. ऐसा विचार करके सामानिक परिषदा के देवोंको बोलाये और पूछाकि मरण की वांच्छा करनेवाला यावत् भोग भोगता हुआ जो विचरता है
●प्रकाशक- राजाबहादुर लाला सुखदेव सहायजी जलाप्रसादजी
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