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शब्दार्थ
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का अनुवादक यालाचारी नि श्री अमोलक ऋषिजी
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हे दि दीव्य दें देवऋदि ना पात् सम्मुख हुइ ॥ ४७ ॥६० ईसान भ० भगवन् ३० देने दकी के कितनी ठि• स्थिति गो. गौतम सा• अषिकदो दीमागगेपम की ठि• स्थिति ॥ ४८ ॥1 ० शान में अगवा दे देवेन्द्र दे. देवराजा ना उस दे० देवलोक से आ. आयुष्य क्षय से जा. यावत् क. कहां म. जावेंगे क. कहां उ० उपजेंगे गो० गौतम म० महाविदेह क्षेत्र में सि सिमेंगे जा० यावत् अं० अंतकरेंगे ॥ ४१ ॥ स० शक्रेन्द्र भं०. भगवन् दे० देवेन्द्र का वि० विमान से ई० ईशान का
अभिसमण्णागए ॥ ४७॥ ईसाणरस भंते देविंदस्स देवरण्णा केवइयं कालं ठिई । • ? गोयमा ! -साइरेगाई दोसागरोवमाणि ठिई १० ॥४८॥ ईसाणेणं भंते ! देविंदे देवराया ताओ देवलोगाओ आउक्खएणं जाव: कहिं गच्छहिति. कहिं उववाजिहिति
गोयमा ! महाविदेहे वासे सिग्झिहिति जाव अंतं काहिति ॥ ४९ ॥ सक्करसणं भंते! यावत् महानुभाव ऐसे माप्त कीण॥४७॥अहो भगवन् ! ईशानेन्द्रकी कितनी स्थिति कही? अहो गौतम! ईशानेन्द्र की दो सोगरोपमसे अधिक स्थिति कही ॥४८॥ अहो भगवन् ! ईशानेन्द्र आयुष्य का क्षय होने पर कहाँ उत्पन होगे? अहो गौतम ! ईशानेन्द्र महाविदेह क्षेत्र में उत्पन्न होकर सीझेंगे बुझेंगे यावत् मवई दाखों का अंत करेंगे।॥४१॥ अहो भगवन् ! शकेन्द्र के विमान से ईशानेन्द्र के विमान क्या ऊंचे व
सायक-राजाबहादुर लाला मुखदेवसायजी मालाणसादगी*
भावार्थ