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शब्दार्थी
भावार्थ
48 अनुवादक- बालब्रह्मचारिमुनि श्री अमोलक ऋषिजी
पादुका कुं· कमंडल आ० वगैरह उ० उपकरण दा० काष्ट के प० पात्र ए० एकान्त में ए० रखकर [ता० ताम्रलिप्ती नगरी की उ० ईशान कोन में णि० प्रमाण मात्र भूमि आ० देखकर सं० संलेखना झू झूसणा झू० झूसकर भ० भक्त पा० पानी प० प्रत्याख्याकर पा० पादोपगमन का काल को अ० नहीं वांछता वि० विचरने को ति० ऐसा करके सं० संकल्पकर ॥ ३० ॥ क० काल जा० यावत् ज० सूर्य उदीत होते जा० यावत् आ० पूछकर ता तामली ए० एकान्त में ए० रखे जा० यावत् भ• भक्त डिग्गहयं गते एडेत्ता तामलित्तीए णगरीए उत्तर पुरच्छिमे दिसीभाए णियत्तणियमंडलं आलिहित्ता संलेहणा झूसणा झूसियस्स भत्तपाण पंडिया इक्खियस्स पाओत्रगयरस कालं अणवकखमाणस्सं विहरित्तए, तिकट्टु एवं संपेहेइ संपेहेइत्ता ॥ ३० ॥ कल्लं जाव जलते जाव आपुच्छइ, आपुच्छइत्ता तामली एगंते एडेइ, सब से मीलकर व उन को पूछकर ताम्रलिप्ती नगरी की मध्य में से नीकलकर मेरी पादुका, कमंडल, काष्टमय पात्र वगैरह सब को एकान्त में डालकर इस नगरी की ईशान कौन में मेरे शरीर प्रमाण क्षेत्र की मर्यादा करके शरीर दुर्बल होवे वैसी संलेखना झूसणा युक्त भक्त पानी का प्रत्याख्यान करके कालको नहीं वांच्छता हुवा विचरुंगा ॥ ३० ॥ ऐसा विचार कर सूर्योदय होते सब को पूछकर व भंडोपकरण एका
प्रकाशक- राजाबहादुर लाला सुखदेवसहायजी ज्वालाप्रसादजी *
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