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शब्दार्थ
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पंचङ्ग डिववपण्णात्ति ( भगवती ) सूत्र
उ० उदात्त उ० उत्तम म० महानुभाग त तपकर्म से सु० मुका भु. भुखा जा. यावत् घ. हड्डी नाडी जा० हुई अ० है जा० जितना मे० मेरा उ. उत्थान के कर्म व बल वी० वीर्य पु० पुरुषात्कार १५० पराक्रम ता० तहां लग से मुझे से. श्रेय क. कल्याण जा. यावत् ज० सूर्य उदीर होते ता० ताम् इलिप्ती न० नगरी दि० देखकर भ० बोलाकर पा०परिचित गि गृहस्थ पु० पूर्व संगति १०पीछे के संगति प० दीक्षाके संगति को आ० पुछकर ता० तामूलिनी न० नगरी की म० मध्य से नि० निकलकर पा० है कम्मणं सुक्के भुक्खे जाव धमणिसंतए जाए, तं आत्थि जामे उट्ठाणे कम्मे बले वीरिए
पुरिसक्कारपरक्कमे ताव तामे सेयं कल्लं जाव जलंते तामलित्तीए णगरीए दिट्ठा भट्टेय पासंडत्येय, गिहत्थेय, पुन्वसंगतिएय, पच्छासंगतिएय, परियायसंगतिएय आपुच्छित्ता ।
तामलित्तीए णयरीए मज्झमझेणं निग्गच्छित्ता पाओगकुंडियमादीयं उवगरणं दारुमयंच मांस रहित नाडियोवाला हुवा हूं. अब जहां लग मेरे में उत्थान कर्म, क्ल, वीर्य व पुरुषात्कार पराक्रा है वहां लग सूर्योदय होते ताम्रलिप्ता नगरी में रहनेवाले कि जिन को देखने का बहुत प्रसंग पडा है, जो
, पाखण्ड धर्म के आचरण करनेवाले हैं परंतु मेरे परिचय में आये हवे है, जो गहस्थ हैं. जो दर्शनाभिलाषी हैं, दीक्षा लीये पहिले जिन की संगति में रहा सो पूर्व संगतिबाले और दीक्षा लिये पीछे १ ० जिन की संगति में रहा सो पश्चात् संगति वाले और अन्य तापतादि कि जो मेरे परिचित हैं उन
-तीसरा शतकका पहिला उद्देशा 98880
भाव
म
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