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शब्दार्थ
अनुवादक-बालब्रह्मचारी मुनि श्री अमोलक ऋार्पजी
तैसे प० प्रणामकरे मे० वह ते. इसलिये जा. यावत् प० प्रवा ॥ २८ ॥ त० तब से वह ता तामलि मो० मोर्यपुत्र से उस उ० उदार वि०विपुल पं० अनुज्ञा प० ग्रहीहुई बा• अज्ञान त तप कर्म से सुसुकाई भुक भुखा जा० यावन् ध० नाडी हड्डी ज• हुइ हो० था॥ २९ ॥ त० तब त. उस ता० तामली बा. अज्ञान ततपस्वी को अकोई वक्त पुरात्रिको अ० अनित्य जा जागरण जा जागते को ए.इसरूप अ. आत्मिक चिं. चितवन जा. यावत् स० उत्पन्न हुवा अ० मैं इ० इस उ० उदार वि० विपुल जा. यावत्
पव्वजा॥२८॥तएणं से तामली मोरिय पुत्ते तेणं उरालेणं विपुलेणं पयत्तेणं पग्गहिएणं बालतवो कम्मेणं सुक्के भुक्खे जार धमणिसंतए, जाएयात्रि होत्था ॥ २९ ॥ तएणं तरस तामलिस्स बाल तवस्सिस्स अण्णया कयाइं पुवरत्तावरत्तकाल समयंसि , सि आणिच्च जागरियं जागरमाणस्स इमेयारूवे अज्झथिए चिंतिए जांव समुप्पजित्था
एवं खलु अहं इमेणं उरालेणं विपुलेणं जाव उदत्तणं उत्तमेणं महाणुभागेणं तवो प्रणाम प्रवा कही है ॥ २८ ॥ तब वह तामली मौर्य पुत्र उदार, विपुल, गुरुकी आज्ञा से कराया हुवा, है बहुत मान पूर्वक कराया हुवा बाल तप कर्म से शुष्क यावत् रक्त मांस रहित नसोंवाला हवा ॥२१॥ एकदा मध्यरात्रि में उस तामली मौर्य पुत्र तपस्सी को अनित्य जागरणा जागते हुवे ऐमा अध्यवसाय चिन्तवन उत्पन हुवा कि ऐसे उदार, विपुल; उदात्त, उत्तर, व महानुभाग तप कर्म से शुष्क यावत् रक्त
प्रकाशक-राजाबहादुर लाला सुखदेवसहायजी जालाप्रसादजी *
भावार्थ