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शब्दार्थ पा० प्रणाम प० प्रवर्नामें प० प्रवर्तनेको प० प्रवर्तग हुवा ए० इसरूप अ० अभिग्रह अ० ग्रहण करूंगा क०
कल्पता है मे० मुझे जा० यावजीव छ० छठ भक्त से अ अंतर रहित त तप कर्म से उ० ऊर्ध बा०14 बाहु प० करके स० मर्याभिमुख आ० आतापनाभूमि में आ. आतापनालेता वि. विचरने को छ. छठ के पारणे में आ० आतापना भामि से उ० नकलकर स० स्वयं दा० काष्ट के प.पात्र ग ग्रहण कर ता. ताम्रलिप्ती न० नगरी में ऊंच नी नाच म० मध्यम कु० कुल के घ० गृह समुदाय में भि० भिक्षाचरी के
आपुच्छित्ता सयमेव दारुमयं पडिग्गहं गहाय मुंडे भवित्ता, पाणामाए पव्वजाए, पव्वइत्तए, पव्वइएवियणं समाणे इमं एयारूवं अभिग्गहं आभिगिाहिस्सामि. कप्पइ मे जावजीवाए छटुं छटेणं अनिक्खित्तेणं तवो कम्मेणं, उट्ठे बाहाओ पगिझिय पगिझिय सूराभिमुहस्स आयावणभूमीए, आयावेमाणस्स विहरित्तए, छट्ठस्सवियणं
पारणयसि आयावणभूमीओ पच्चोरुहित्ता, सयमेव दारुमयं पडिग्गहं गहाय तामाल
? तीए णयरीए उच्चणीयमज्झिमाइ कुलाई घरसमुदाणस्स भिखायरियाए: अडेत्ता भावार्थ 60 मुझे श्रेय है. इस तरह प्रपा अंगीकार किये पीछे छठ २ का निरंतर तप करके ऊंचे बाहु से आ
तापना भूमि में आतापना लेना मुझे श्रेय है. वैसे ही छठ भक्त के पारणे के दिन उस आतापना भूमि से नीकलकर काष्टमय पात्र लेकर ताम्रलिप्ती नगरीमें उच्च, नीच, मध्यम कुलमें बहुत घरोंके समुदाय में फीरकर ।
पंचमांग विवाह पण्णत्ति ( भवगती)
तीसरा शतक का पहिला उद्देशान48