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शब्दार्थ प्राणत ण० विशेष व० बत्तीस के० संपूर्ण ए० ऐसे अ० अच्युत में ण० विशेष सा० अधिक प० बत्तीस {के० संपूर्ण नं० जंबूद्वीप अ० निश्चय सं० वह ए० ऐसे भं० भगवान् त० तीसरे गो० गौतम बा० वायुभूति अ० अनगार स० श्रमण भ० भगवन्त म० महावीर को वं० वंदनाकर न० नमस्कार कर वि०
सूत्र
भावार्थ
९३ अनुवादक बालब्रह्मचारी मुनि श्री अमोलक ऋषिजी
केवलं सहस्सारे साइरेगे सोलस एवं पाणएवि, णवरं बत्तीस केवलं एवं अच्चुएवि, णवरं साइरेगे बत्तीसं केवलकप्पे जंबूदीचे दीवे, अण्णं तं चेत्र ॥ सेवं भंते भंते ! ति तच्चे गोयमे वाउभई अणगारे समणं भगवं महावीरं वंदइ नमसइ जाव विहरइ
प्रकाशक- राजाबहादुर लाला सुखदेव सहायजी ज्वालाप्रसादजी *
इस लाख, सनत्कुमार में बारह लाख, माहेन्द्र में आठ लाख, ब्रह्मदेवलोक में चार लाख, लांतक में पच्चास {हजार, महाशुक्र में चालीस हजार सहस्रार में छ हजार, आणत प्राणत में चारसो, आरण अच्युत में तीनसो. अब सामानिक देव कहते हैं सौधर्मेन्द्र को चौरासी हजार, ईशानेन्द्र को अस्सी हजार, सनत्कुमारेन्द्र को बहत्तर हजार, माहेन्द्र को पीत्तर हजार, ब्रह्मेन्द्र को साठ हजार, लांतकेन्द्र को पच्चास हजार, महाशुक्रेन्द्रको चालिस हजार, महस्रारेन्द्र को तीस हजार, प्राणतेन्द्र को वीस हजार, और अच्युतेन्द्र को दश हजार सा{मानिक जानना. सामानिक देवता से आलरक्षक चौगुने जानना. अहो भगवन् ! आपके वचन सत्य हैं। ऐसा कहकर वायुभूति नामक अनगार श्रवण भगवंत महावीर सामी को वंदना
नमस्कार कर विचरने
જર