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________________ शब्दार्थ - 4. अनुवादक-बालब्रह्मचारी मुनि श्री अमोलक ऋषिजी केवल कल्प ज. जंबूद्वीप भा• कहना से० शेष तं तैसे णि निर्विशेष णे जानना णा. नाना प्रकार जा० जानना भ० भवन सा० सामानिक से स. वह ए. ऐसे भं. भगवन् त. तीसरे गो० गौतम वाota वायुभूति अ० अनगार वि. विचरते हैं ॥ १०॥ त तब दो० दूसरे गो. गौतम अ. अमिभूसि अ० अनगार स० श्रमण भ० भगवन्त को वं० वंदना कर ए० ऐसा व० बोले ज० यदि ब..बलि ५० णवरं साइरेगं केवलकप्पं जंबुद्दीवं भाणियव्वं, सेसंतंचव णिरवसेसं णेयन्वं, णवरं । णाणत्तं जाणियव्वं, भवणेहिं, सामाणिएहिं सेवं भंते भंते! ति, तच्चे गोयमे वायुभूती अणगारे जाव विहरइ ॥ १० ॥ तएणं से दोच्चे गोयमे अग्गिभूई अणगारे समणं भगवं महावीरं वंदइ वंदइत्ता एवं वयासी, जइणं भंते ! बली वइरोयणिंदे वइरोजानना. बलि नामक वैरोचनेन्द्र को तीस लाख भुवन व साठ सहस्र सामानिक देवता जानना.. भगवन् ! जैसे आप कहते हैं वैसे ही हैं. इस तरह सुनकर वंदना नमस्कार करके श्री वायुभूति अनगार विचरने लगे ॥ १० ॥ पुनः अग्निभूति नामक अनगारने श्रमण भगवंत महावीर को वंदना नमस्कार करके ऐसा प्रश्न पूछा कि अहो भगवन ! बाल नामक वैरोचनेंद्र इतना महर्दिक यावत् इतने वैक्रेय रूप करने को समर्थ है तब अहो भगवन् ! धरणेन्द्र नामक नाग कुपारेन्द्र कितना महर्दिक यावत् कितने वैक्रय रूप, प्रकाशक-राजाबहादुर लाला मुखदेवसहायजी ज्वालाप्रसादजी
SR No.600259
Book TitleAgam 05 Ang 05 Bhagvati Vyakhya Prajnapti Sutra Sthanakvasi
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAmolakrushi Maharaj
PublisherRaja Bahaddurlal Sukhdevsahayji Jwalaprasadji Johari
Publication Year
Total Pages3132
LanguageSanskrit
ClassificationManuscript & agam_bhagwati
File Size50 MB
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