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शब्दार्थ से उ० युक्त सि० होवे एक ऐसे गो० गौतम च० चमर अ० असुरेन्द्र अ० असुरराजा ० बैक्रय सही
समुद्घात स. पूरे स० पूरकर सं० संख्यात जो योजन० ऊंचा दं. दंड को नि. निकाले तं. वह ज. नैसे र० रन जा. यावत् रि• रिष्ट अ० यथा बा० बादर पो० पुद्गल प० दूरकर अ० यथा सु०१ सूक्ष्म पो० पुगल ५० ग्रहणकरे दो दूनरी वक्त वे वैक्रेय स० समुद्घात से स. पूरे प० समर्थ मो० गौतम च. चमर अ० असुरेन्द्र अ० असुरराजा के केवल कल्प जे. जंबुद्धीप ब. बहुत अ० असुरकुमार दे०
वानाभी अरगाउत्तासिया एवामेव गोयमा ! चमरे असुरिंदे असुरराया वेउब्वियसमुग्धाएणं ।
समोहणइ समोहणइत्ता संखेजाणि जोयणाणि उड्डेदंडं निसिरइतंजहारयणाणं जाव रिट्ठाणं ____ अहा बायरे पोग्गले परिसाडेइ परिसाडेइत्ताअहासुहमे पोग्गले परियाइयइ, परियाइयइत्ता -
दोच्चविवेउब्वियसमुग्घाएणं समोहणइ,पभूणं गोयमा ! चमेरे असुरिंदे असुरराया केवलकप्पं भावार्थ नामक असुरेन्द्र वैकेय समुद्घात करे. वैक्रेय समुद्घात करके संख्यात योजन का ऊंचा दंड करे.
बहुन दलवाला व शरीर जितना चौडा, जीव प्रदेश व कर्म पुद्गलों का समुह बनाये. उस में कर्केतनादि विविध 29
१ यद्यपि कर्केतनादिक रत्नके पुद्गल औदारिक शरीरमय हैं और वक्रय समुदूधात वैक्रेय पुद्गल ग्रहण करनेसे ई होती. परंतु यहॉपर रत्नसार पदार्थ होने से कतनादि जैसे पुदलों ऐसा अर्थ लेना. कितनेक ऐसाथी मकहते हैं कि उदारिक पने ग्रहण किये पुद्गल बक्रेय पने परिणमते है.
पंचमांम विवाह पण्णत्ति ( भारती ) मूत्र
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.तीसरा शतक का पहिला उद्देशान
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