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शब्दार्थ ४०
अ० अधो स० सातमी नरक ॥ ११ ॥ जे. जंबदीपादि दी द्वीप ल० लवण समुद्रादि स० समुद्र एक ऐसे सो० सौधर्म देवलोक जा. यावत् इ० ईसत्पागभार पु० पृथ्वी ते वे अ० असंख्यातवे भा० भाग को फु.
एवं जाव अहेसत्तमाए॥११॥ जंबूद्दीवाइया दीवा, लवणसमुद्दाइया समुद्दाएवं सोहम्मेकप्पे जाव इसिपब्भाए पुढवीए तेसव्वेवि असंखेजद्द भागं फुसइ । सेसा पडिसेहेयव्वा । एवं अधम्मात्थकाए एवं लोयागासेवि ॥ गाथा ॥ पुढवीउदहिघणतणू । क
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अनुवादक-बालब्रह्मचारी मुनि श्री अमोलक ऋषिजी
जम्बूदीप आदि सब द्वीप, लवण समुद्रादि सब समुद्र, सौधर्मादि देवलोक से लेकर बारह देवलोक, नव ग्रैवेयक, पांच अनुत्तर विमान, और ईषत्यागभार पृथ्वी इन सब को धर्मास्तिकाया का असंख्यातवा भाग स्पर्श कर रहा है परंतु संख्यातवा भाग व संख्यात व असंख्यात भाग में, वैसे ही सब धर्मास्तिकाय स्पर्श कर नहीं रही है. जैसे धर्मास्तिकाय की वक्तव्यता कही वैसे ही अधर्मास्तिकाया व लोकाकाश का जानना. सात पृथ्वी, सात घनोदधि, सात घनवात, सात तनुवात, बारह देवलोक, नव अवेयक, पांच अनुत्तर विमान, सिद्धशिला इन सब में जो आकाशान्तर है उन को धर्मास्तिकायादि संख्यातवे भाग में से स्पर्श कर रहे हैं. पृथ्वी, घनोदधि, घनवात, तनुवात व आकाश इन एकेक के सात २ सूत्र करने से १३५ हुए. बारह देवलोक के बारह, नव ग्रैधेयक के ३, पांच अनुत्तर विमान का १ और सिद्धशिलाकाई
* प्रकाशक-राजाबहादुर लाला सुखदेवसहाय जी ज्यालाप्रसादजी *