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________________ शब्दाथा भावाथ पंचमांग विवाह पण्णत्ति ( भगवती ) सूत्र--28 नहीं अ० अधर्मास्ति काय का देश अ० अधर्मास्ति काय का प्रदेश अकाल ॥५॥ अ० अलोकाकाश में भं० । भगवन् कि० क्या जी० जीव गो० गौतम नो नहीं जीव जा. यावत् नो० नहीं अजीव प्रदेश ए. एक पंचविहा पण्णंता तंजहा धम्मत्थिकाए, नो धम्मत्थिकायस्स देसे,धम्मत्थिकायस्सपदेसा ३८७ है अधम्मत्थिकाए, नो अधम्मत्थिकायस्स देसे; अधम्मात्थकायरस पदेसा । अद्धासमए ॥ ५॥ अलोयाकासेणं भंते ! किं जीवा पुच्छा तहचेव, गोयमा ! नो जीवा जाव और ५ काल. * ॥ ५ ॥ अहो भगवन् ! अलोकाकाश में क्या जीव, जीव के देश व प्रदेश वगैरह हैं ? अहो गौतम ! अलोकाकाश में जीव, जीव के देश व प्रदेश यावत् अजीव के प्रदेश नहीं हैं परंतु अगुरुलघुभून । ____* अजीव अरूपिके सब मीलकर दश भेद किये हैं; उसमेंसे यहां पांचही ग्रहण किये हैं उसका सबब यह है कि यहां पर आकाश आश्रित पृच्छाहै इससे आकाशास्तिकायाका स्कंध, देश व प्रदेश यह तीन नहीं ग्रहण कियाँ मात्र धर्मास्तिकाया व अधर्मास्तिकायाकै स्कंधव प्रदेश ग्रहण कियेहैं. धर्मास्ति काय व अधर्मास्तिकायके देश नहीं ग्रहण करनेका सबब यह है कि जब संपूर्ण वस्तुको विवक्षा की जाती है तब धर्मास्तिकाय ऐसाही कहाजायगा और उसके अंशकी विवक्षा करे तब उसके प्रदेश ही ग्रहण किये जायेंगे. क्योंकि ये दोनों o आस्थित हैं इनकी हानि वृद्धि नहीं होतीहै इससे स्कंध व प्रदेश ग्रहण किये गये हैं और देशका प्रतिबंध कियाहै. 40340984 दूसरा शतकका दशवा उद्दशा 498 as
SR No.600259
Book TitleAgam 05 Ang 05 Bhagvati Vyakhya Prajnapti Sutra Sthanakvasi
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAmolakrushi Maharaj
PublisherRaja Bahaddurlal Sukhdevsahayji Jwalaprasadji Johari
Publication Year
Total Pages3132
LanguageSanskrit
ClassificationManuscript & agam_bhagwati
File Size50 MB
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