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शब्दार्थ |
सूत्र
सूत्र
* २० पंचमांग विवाह पण्णत्ति ( भगवती
भावार्थ ।
नहीं कः कदापि नः नहीं है जा० यावत् निः नित्य भा भाव से अ अ अ अ अ अरस अ० अस्पर्श गु० गुण से ग गमन गुण अ० अधर्मास्तिकाय ए ऐसे न० विशेष गुण से स्थानगुण आ आकाशास्तिकाय ए० ऐसे न० विशेष खे० क्षेत्र से लो० लोकानेक प्रमाण अ अनंत जा यावत् गुण में अ अवगाहना गुण जी० जीवास्तिकाय में मंगल कितना वर्ण गं० वं र० रम फर स्पर्श गो० गौतन अ० अवर्ण जा० यावत् अ० अरूपी जी० जीव सा न आसि न कवाइ नत्थि जाव निचे, भावओ अबन्ने अगंधे, अरसे, अकासे, गुणओ गणगुणे अहम्मत्थि काएवि एवं चेत्र नवरं गुणओ ठाणगुणे ॥ आगासत्थि काएवि एवं चैत्र नवरं खेत्तओगं आगासत्थिकाए, लोयालोयप्पमाणमेत्ते अणतेचेव, जाव गुणओ अवगाहगुणे ॥ जीवत्थिकारणं भंते ! कइवण्णे, कइगंधे, संपूर्ण लोक प्रमाण, काल से अतीत काल में नहीं था वैसा नहीं, वर्तमान में नहीं है वैसा नहीं, और अनागत में नहीं होगा वैसा नहीं परंतु अतीत काल में था, वर्तमान है और अनागत में होगा यावत् नित्य रहेगा. भाव से धर्मारिकाय में वर्ण, गंध, रस व स्पर्श नहीं होते हैं और गुण से धर्मास्तिकाया में गमन गुण जैसे मत्स्य को जल का आश्रय रहता है वैसे ही जीव पुगलको धर्मास्ति कायगीत कराताॐॐॐ अस्ति कायाका भी वैसे ही जानना मात्र स्थिर गुण ग्रहण करना. आकाशास्ति काय में भी धर्मास्ति ।
दूसरा शतक का दशा उद्देशा
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