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शब्दार्थ
*दे देव की व. वक्तव्यता सा वह भा० कहना नविशेष भ० भवन 40 प्ररूपे उ. उपपात से लो.
लोक का अ० असंख्यात का भाग एक ऐसे स० सर्व भा० कहना जा. यावत सि सिद्धि स्थान स०१ संपूर्ण क० कल्प प० प्रतिस्थान ०जाडपना उ.ऊंचा सं० संस्थान जी जीवाभिगम में जा० यावत्
अनुबादक-गालब्रह्मचारी मुनि श्री अमोलक ऋषीजी
सा भाणियव्वा. नवरं भवणा पण्णत्ता, उववाएण लोयस्स असंखजइ भागे, एवं सव्वं भाणियव्वं, जाव सिद्धगंडिया सम्मत्ता ॥ कप्पाण पइट्ठाणं, बाहल्लुच्चत्तमेव संठाण जीवाभिगमे जाव वेमाणि उद्देसो भाणियब्वो ॥ बिईयसए सत्तमो
*प्रकाशक-राजाबहादुर लाला सुखदेवसहायजी ज्वालाप्रसादजी*
भाग में वर्तते हैं, उत्तर दक्षिण में रहनेवाले सब भवनपति. वाणव्यंतर ज्योतिषी, ववैमानिकके स्थानक का वर्णन यावत् सिद्ध स्थान प्रतिपादक प्रकरणतक का सब वर्णन जीवाभिगम सूत्र से जानना. उस का किंचित् विस्तार यह है. १ कल्प में विमानों का आधार. सौधर्म ईशान देवलोक में विमानों घनोदाधिमतिष्ठित हे २ विमान का पिंड-सौधर्म ईशान देवलोक में २७०० योजन का पिण्ड है ३ ऊंचाइ-सौधर्म ईईशान देवलोक में पांचसो योजन के ऊंवे विमान कहे हैं. ४ संस्थान-सौधर्म ईशान देवलोक में आवालिका प्रविष्ट व्यंत, चउरंस व वर्तुलाकार विमानों हैं, और आवालिका बाहिर विविध प्रकार के संस्थान वाले हैं. इस सिवाय और भी विमानका आवालिका परिमाण, वर्ण, प्रभा, गंधादि जीवाभिगम सूत्रके वैमानिक
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