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शब्दार्थ |
सूत्र
भवार्थ
+3 अनुवादक - बालब्रह्मचारी मुनि श्री अमोलक
( समय मं० भगवन ते० वे थे० स्थावर भ० भगवन्तं ते० उन स० श्रमणोपासक के ए० ऐसे वा० प्रश्न ( वा० कहने को अ० नहीं समर्थ स० अभ्यास वाले उ० अथवा अ० अभ्यास रहित आ ज्ञानवंत अ० ज्ञानरहित पु० विज्ञानवंत अ० विज्ञानरहित पु° पूर्वतपसे अ० आर्य देव देव दे० देवलोक में उ० उत्पन्न { होवे पु० पूर्व संयम से क० कर्म से सं० संगसे दे० देव दे० देवलोक में उ० उत्पन्न होवे स० सत्य ए० ( यह अर्थ णो० नहीं आ० आत्म भाव व० वक्तव्यता ॥ २२ ॥ प० समर्थ गो० गौतम ते ० वे ( स्थविर भ० भगवन्त ते० उन स० श्रमणोपासक को ए० ऐसे बा० प्रश्न को वा० कहने को पो० नहीं
थे०
सच्चेणं एसमट्ठे णोचेत्रणं आयभाववत्तन्वयाए ॥ २२ ॥ पणं गोयमा ! तेथे भगवंतो तेसिं समणोवासयाणं इमाई एयारूवाई वागरणाई वागरेत अपभू तहचेत्र नेय, अवसेसियं जाव पभू समियं आउज्जिय पलिउज्जिय
{ वाले नहीं हैं ? ।। २२ ।। अहो गौतम ! उन श्रावकों के प्रश्नों का उत्तर देने को वे स्थविर भगवन्त {समर्थ, अभ्यासवाले, ज्ञानवन्त व परिज्ञानवन्त हैं परंतु असमर्थ, अनभ्यासवाले, अज्ञानवन्त व अपरिज्ञानवन्त नहीं हैं ॥ २३ ॥ अहो गौतम ! मैं भी ऐसा कहता हूं यावत् प्ररूपता हूं कि पूर्व - सराग तप से देवता देवलोक में उत्पन्न होते हैं वैसे ही पूर्व संयम, कर्म विकार व संगति से देवता देवलोक में उत्पन्न होते हैं.
प्रकाशक- राजाबहादुर लाला सुखदेव सहायजी ज्वालामसादजी *
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