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शब्दार्थ
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87 पंचमांग विवाह पण्णत्ति ( भगवती ) मूत्र 88
महावीर रा० राजगृह न० नगरके गु० गुणशील.चे. उद्यान से प० निकलकर ब. बाहिर ज. अन्यदेश ? में वि० विचरनेलगे ॥१०॥ ते. उस काल ते. उस समय में तुं० तुंगीया न० नगरी हो० थी २०१ वर्णनयुक्त ॥११॥ ती. उस तु तुंगीया नगरीकी ब. बाहिर उ. ईशान कौन में पु. पुष्पवती चे० उद्यान हो० था त० तहां तु तुगीया न० नगरी में ब. बहुत स० श्रमणोपासक प०.रहते हैं अ० ऋद्धि-१३ ३ समण भगवं महावारे रायगिहाओ नयराओ गुणसिलाओ चेइयाओ पडिनि है
क्खमइ पडिनिक्खमइत्ता बहिया जणवयविहारं विहरइ ॥ १० ॥ तेणं कालेणं तेणं समएणं तुंगिया नाम नयरी होत्था, वण्णओ, तीसणं तुंगियाए नयरीए बहिया । उत्तरपुरच्छिमे दिसीभाए पुप्फवइए नामं चेइए होत्था. वण्णओ ॥ ११ ॥ तत्यणं तुंगियाए नयरीए बहवे समणोवासया परिवसंति. अड्डा, दित्ता, विच्छिण्ण ।
श्री श्रमण भगवन्त महावीर स्वामी राजगृह नगर के गुणशील नामक उद्यान में से नीकलकर अन्य देशमें विचरने लगे ॥ १० ॥ उस काल उस समय में तुंगेया नाम की नगरी थी. उस का? वर्णन उवाई सूत्र में चंपा नगरी का वर्णन जैसे कहना. उस तुगिया नगरी की ईशान कौन में पुष्प वती नामक उद्यान था. उस का वर्णन उपवाई में से जानना ॥ ११ ॥ उस तुंगीया नगरी में बहुत श्रमणोपासक (श्रावक) रहते थे. वे धन धान्य से परिपूर्ण, बलवंत, विस्तार युक्त बहुत भवन, शयन
दूसरा शतक का पांचवा उद्देशा-8-408
भावार्थ
इतब