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शब्दार्थ
42 अनुवादक-बालब्रह्मचारी मुनि श्री अमोलक ऋषिजी +
शीघ्र आ० आवे ॥८॥ मे० मैथुन भं० भगवन् से. सेवता के० कैसे अ० असंयम क. करे गो. गौतम से०वह ज जैसे के०कोइ पु०पुरुष रुरुइकी नालिका बू० वांस के बूरेकी नालिका में त तपा हुवा क० खिला से स० जलावे एक ऐसे गो० गौतम मे० मैथुन स. सेवता अ० असंयम क० करे स. वह ए० ऐसे में भगवन् त्ति ऐसे जा . यावत् वि० विचरने लगे ॥ ९ ॥ त तब स. श्रमण भ० भगवन्त म.
पुत्तत्ताए हव्वमागच्छंति. से तेणटेणं जाव हव्वमागच्छइ ॥ ८ ॥ मेहुणणं भंते ! सेवमाणस्स केरिसे असंजमे कज्जइ ? गोयमा ! से जहानामए केइ पुरिसे रूयनालियंवा, बूरनालियंवा, तत्तेणं कणएणं समभिधंसेजा, एरिसएणं गोयमा ! मेहुणं
सेवमाणस्स असंजमे कजइ ॥ सेवं भंते भंतेत्ति जाव विहरइ ॥ ९ ॥ तएणं । एक जीव को पुत्रपने एक भव में उत्पन्न होते हैं. ॥८॥ अहो भगवन् ! पैथुन सेवने वाले को किम तरह असंयम होवे ? अहो गौतम ! जैसे कोई पुरुष रूह या मूके काष्ट के बूरे को नालीका में भरे, फीर आनि से तपाकर रक्त बनाया हुवा लोहे का दंड उस नाली में डाले, इस से उस में रही हुई रूइजैसे जलजाती है वैसे ही मैथुन करते योनि में रहे हुवे जीवों नष्ट होजाते हैं. और इस तरह जीव का नाश होने से असंयम होता है. अहो भगवन् ! आपके वचन यथातथ्य हैं ऐसा कहते श्री गौतम स्वामी विचर रहे हैं॥९॥
प्रकाशक-राजाबहादुर लाला सुखदेव सहायजी ज्वाराप्रसादजी
भावार्थ