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शब्दाथ ज. जघन्य अं० अंतर्मुहूर्त उ० उत्कृष्ट बा० बारह सं० संवत्सर ॥ ४॥ का. काय भव में रहा हुवा
का कालमे के.कितना काल हो. होवे गो० गौतम ज. जघन्य अं अंतर्मुहूर्त उ० उत्कृष्ट च० चौवीस सं• संवत्सर ॥ ५॥ मं० मनुष्य पं० पंचेन्द्रिय तिः तिर्यंच बी० बीज से भं० भगवन् जो० योनिमें 20
गम्भांते कालओ केवचिरं होइ ? गोयमा ! जहन्नं अंतो महत्तं उक्कोसं बारस . संवच्छराई ॥ ४ ॥ कायभवत्थेणं भते ! कायभवत्थेति कालओ केवचिरं होइ ?
गोयमा ! जहण्ण मंतोमुहुत्तं, उक्कोसेणं चउवीस संबच्छराइं ॥ ५॥ मणुस्सपांचं
दिय तिरिक्ख जोणिय बीएणं भंते ! जोणियब्भूए केवइयं कालं संचिट्ठइ ? जहन्नेणं मनुष्य का गर्भ कितने कालतक रहता है ? अहो गौतम ! मनुष्य का गर्भ जघन्य अंतर्मुहूर्त उत्कृष्ट बारह वर्ष ॥ ४ ॥ अहो भगवन् ! कायभवस्थ जीव कायभवस्थ में कितना कालतक रहे ? अहो गौतम ! कायभवस्थ जीव जघन्य अंतर्मुहर्त उत्कृष्ट चौवीस वर्ष. स्त्री के गर्भ में एक जीव बारह वर्ष रहकर काल कर जाये और पुनः वहांही उत्पन्न होकर बारह वर्ष रहे अथवा उस बारह वर्ष रहकर चबाहुवा जीव के शरीर में अन्य जीव आकर बारह वर्ष रहे ॥ ५ ॥ अहो भगवन् ! संज्ञी पंचेन्द्रिय मनुष्य व संज्ञी पंचे
१ जनन्युदरमध्यव्यवस्थितनिजदेह एव यो भवो जन्म स कायभवः तत्र तिष्ठति यः स कायभवस्वः। 10 अर्थात् माताके उदरमें रहवाडा निजदेहरूप भवमें रहनेवाला सो कायभवस्थ. ॥
42-43 पंचमांग विवाह पण्णत्ति (भवगती) सूत्र
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४१दूसरा शतक का पांचवा उद्देशा880