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शब्दाथक० कितनी भ० भगवन् स. समुद्घात प.मरूपी गो० गौतम स सात स० समुद्यात ५० रूपी सं०14
वह ज. जैसे वे वेदना समुद्घात ए. ऐसे स० समुद्घात प० पद० छनस्थ समुद्घात ब० वर्ज कर भा० कहना मा० यावत् वे वैमानिक क. कषाय समुद्वात अ० अल्पाबहुत ॥१॥ १. अनगार
कइणं भंते ! समुग्धाया पण्णत्ता ? गोयमा ! सत्त समुग्धाया पण्णत्ता तंजहा वयणा समुग्याए, एनं समग्वायपयं, छउमस्थिय समुग्धाय वजं भाणियन्वं, जाव वैमाणियाणं, कसाय समुग्धाया अप्पाबहुयं ॥ १ ॥ अणगारस्सणं भंते ! भाविपहिले उद्देशे के अंत में किस मरण से मरनेवाला जीव संसार की सादर हानि करता है ऐसा मरण । का अधिकार कहा. वह मरण मारणान्तिक समुद्घात से होता है इसलिये मरण समुद्घात का आधिकार कहते हैं. अहो भगवन् ! समुदघात कितने प्रकार की कही है? अहो गौतम ! ममुद्घात सात प्रकार की कही है. वेदना समुड्यात २ कपाय समुद्रात ३ मारणान्तिक समुद्घात ४ वैकेय समुद्रघात ५ तेजस समुद्घात ६ आहारक समुद्घात और केवली समुदयात. इन सातों समुद्घात में श.. रीर से जीव प्रदेश का निर्गम होता है. केवली समुद्घात करते आठ समय लगता है और अन्य समुद
यात में अंतर्मुहर्न काल व्यतीत होना है. नरक व वायुकाय में चार समुदयात. चार स्थावर तीन विकले है। सन्द्रिय में तीन समुद्घात, देवता का तिर्वच पवेन्दिर में पांच समुद्रात, और मनुष्य व समुच्चय जीव में सात
पंचमाङ्ग विवाह पण्णाति ( भगरती ) सत्र +3gt
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488+4 दूसरा शतक का दूसरा उद्देशा