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शब्दार्थ
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48 अनुवादक-यालब्रह्मचारी मुनि श्री अमोलक ऋषिजी
अ० अर्थ स. योग्य ह. हा अ० है अ० जला मुख दे० देवानुप्रिय मा० मत प० विलमः ॥३२॥ ततब खे० खंदक अ० अनगार स: श्रमण भ० भगवन्त म० महावीर से अ० आज्ञापाया हुवा. ह. हृष्ट तुम तुष्ट जा. यावत् इ० आनंदित हृदयवाला उ० उपस्थित हुये उ• उपस्थित होकर स० श्रमण भ० भगवन्ती म. महावीर को ति तीनवार आ० आदान प० प्रदक्षिणा क० करना है जा. यावत् न. नमस्कार कर स० स्वयं पं० पांच म. महाव्रत आ० आराधकर स० साधु स. साधी से खा० क्षमायाची खा०
अहासुहं देवाणुप्पिया, मा पडिबंधं ॥३२॥ तएणं से खंदए अणगारे समणणं भगवया है महावीरेणं अभणुण्णाए समाणे हट्ठतुट्ठ जाव हयहियए उट्ठाए उढेइ २ त्ता समणं E भगवं महावीर तिक्खुत्तो आयाहिणं पयाहिणं करेइ, जाव नमसित्ता सयमेव
पंच महब्बयाई आरुहेइ. आरुहेइत्ता समणाय समणीओय खामेइ खामेइत्ता
तहारूवेहिं थेरोहिं कडाइहिं सदि विपुलं पव्वयं सणियं सणियं दुरूहेइ दुरूहेइत्ता मिय ! जैसे तुम को सुख होवे वैसा करो. ऐसे कार्य में विलम्ब मत करो ॥३२॥ उस समय में खंदक अनगार श्री श्रमण भगवंत महावीर की आज्ञा मालने से हर्षित होकर उठे, उठकर श्रमण भगवन्त महावीर को तीन वार आदान मदाक्षिणा कर यावत् नमस्कार कर स्वयं पांच महाव्रत की आराधना कर व साधु साध्वियों की क्षमा मांगकर तथारूप स्थविर को साथ लेकर बड़े पर्वतपर शनैः चड़े.. वहां चड. कर मेघस-17
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प्रकाशक-राजाबहादुर लाला सुखदेवसहायजी ज्वालापसाइजी
भावाथे