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शब्दार्थ
सूत्र
बडा प० पर्वत स शनैः दु० चढकर मे० मेघधन सं० समान देदेव सन्निपात पु. पृथ्वी शिलापट १० देख कर द०दर्भ का सं. संथारा मं० विछाकर द० दर्भके सं० संधारेपर रहाहुवा सं० संलेखना को झू. सेवा से झू० सेवित भ. भक्त पानका प० प्रत्याख्यान करने वाला पा० पादोपगमन का का० काल अ० नहीं। वांच्छता वि. विचरने को ते. ऐसा क० करना ॥ ३० ॥ ए. ऐसा सं० विचारता है से० विचारकर 4३१० क. कल ५० प्रगट प. प्रभात में र० रात्रि को जा. यावत् ज० चलंत जा. यावर् प० पर्युपासना की। ॥ ३१ ॥ खंदकादि त० तुम को णू शंकादी पु० पूर्वरात्रि में अ० अरक्त जा. यावत् जा० जाने
देवसन्निवायं, पढविसिलापट्टयं पडिलेहेत्ता, दब्भ संथारयं संथारत्ता, दब्भ संथारोवगयस्स सलेहणा झूसणा झूलियस्स भत्तपाणपडियाइक्खियस्त पाओव.यस्त कालं अणवंकखमाणस्स विहरित्तए त्तिकटु ॥ ३० ॥ एवं संपेहेइ एवं संपेहेइत्ता कल्लं पाउप्पभायाए रयणाए जाव जलंते जेणव समगे भगवं महावीरे जाव पज्जुवासइ
॥ ३१ ॥ खंदयादि समणे · भगवं महावीरे खंदयं अणगारं एवं वयासी सेणूणं होने से मुंदर ऐसी शिलापट को देखकर दर्भ का संथारा पिछाकर दर्भ संथारा में रहा हुवा संलेखना से अपनी आत्मा को कर्म से निर्मल बना कर व भक्त पान का प्रत्याख्यान कर काल को नहीं बांच्छता हवा विचरना मुझे श्रेय है ॥ ३० ॥ ऐना विचार करके प्रभात होते जहां श्रमण : भगवन्त महावीर स्वामी थे वहां आकर वंदना नमस्कार यावत् पर्युपासना की ॥ ३१!! श्रमण भगवंत महावीर खंदक अन
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१०१ अनुवादक-बालब्रह्मचारी मुनि
प्रकाशक-राजाबहादुर लाल्य सुखदेवसहायजी ज्वालाप्रसादजी *
भावार्थ